<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>        <rss version="2.0"
             xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
             xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
             xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
             xmlns:admin="http://webns.net/mvcb/"
             xmlns:rdf="http://www.w3.org/1999/02/22-rdf-syntax-ns#"
             xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/">
        <channel>
            <title>
									Rangin Kahani Forum - Recent Topics				            </title>
            <link>https://ranginkahani.fun/community/</link>
            <description>Rangin Kahani Discussion Board</description>
            <language>en-US</language>
            <lastBuildDate>Mon, 13 Apr 2026 21:44:45 +0000</lastBuildDate>
            <generator>wpForo</generator>
            <ttl>60</ttl>
							                    <item>
                        <title>Нужен совет по выбору оптимального варианта</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%d0%bd%d1%83%d0%b6%d0%b5%d0%bd-%d1%81%d0%be%d0%b2%d0%b5%d1%82-%d0%bf%d0%be-%d0%b2%d1%8b%d0%b1%d0%be%d1%80%d1%83-%d0%be%d0%bf%d1%82%d0%b8%d0%bc%d0%b0%d0%bb%d1%8c%d0%bd%d0%be%d0%b3%d0%be-%d0%b2%d0%b0/</link>
                        <pubDate>Mon, 02 Mar 2026 22:38:47 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[Всем привет. Столкнулся с задачей и пока не могу определиться с оптимальным решением. Вариантов несколько, у каждого свои плюсы и минусы. Хотелось бы услышать мнение тех, кто уже проходил че...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[Всем привет. Столкнулся с задачей и пока не могу определиться с оптимальным решением. Вариантов несколько, у каждого свои плюсы и минусы. Хотелось бы услышать мнение тех, кто уже проходил через это. Что в итоге оказалось самым практичным в долгосрочной перспективе? Буду благодарен за любые рекомендации и личный опыт.]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>DonaldVam</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%d0%bd%d1%83%d0%b6%d0%b5%d0%bd-%d1%81%d0%be%d0%b2%d0%b5%d1%82-%d0%bf%d0%be-%d0%b2%d1%8b%d0%b1%d0%be%d1%80%d1%83-%d0%be%d0%bf%d1%82%d0%b8%d0%bc%d0%b0%d0%bb%d1%8c%d0%bd%d0%be%d0%b3%d0%be-%d0%b2%d0%b0/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>जिस्म की प्यास</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8/</link>
                        <pubDate>Sun, 04 May 2025 16:10:21 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[जिस्म की प्यास जब जागती है तो अच्छे अच्छों के दिमाग घास चरने चले जाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ।
मैं एक सीधी सादी लड़की बस अपने फैशन डिज़ाइनिंग कोर्स में ही मस्त रहती थी। फैशन की दुनि...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p dir="auto">जिस्म की प्यास जब जागती है तो अच्छे अच्छों के दिमाग घास चरने चले जाते हैं। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ।</p>
<p dir="auto">मैं एक सीधी सादी लड़की बस अपने फैशन डिज़ाइनिंग कोर्स में ही मस्त रहती थी। फैशन की दुनिया में अपना नाम बनाना चाहती थी, बस दिन रात नए नए डिज़ाइन सोचा करती थी और उनकी ड्रॉइंग बनाया करती थी।</p>
<p dir="auto">एक दिन ऐसा कुछ हुआ कि मेरी जिंदगी के बारे में सोचने का नज़रिया ही बदल गया। इससे पहले कि मैं अपनी कहानी आपको सुनाऊँ मैं अपने परिवार के बारे में आपको बताती हूँ:</p>
<p dir="auto">रमेश कपूर - 49 yrs हैवी बिल्ट बॉडी - एक नंबर के चोदू - बस चूत पसंद आनी चाहिए फिर नहीं बचती। अपना बिज़नेस चला रहे हैं। पैसे की पूरी रेल पेल है।</p>
<p dir="auto">काम्या - 44 साल लगती है 30 साल की - 38-30-38 - हाउसवाइफ</p>
<p dir="auto">विमल: 24 साल मेरा बड़ा भाई - MBA कर रहा है हॉस्टल में रहता है। हफ्ते में एक बार घर ज़रूर आता है। एक दम हीरो के माफिक पर्सनैलिटी, लड़कियाँ देख कर ही आहें भरने लगती हैं।</p>
<p dir="auto">मैं: रम्या - 20 साल 34-24-30 मुझे देखते ही सबके लंड खड़े हो जाते हैं। फैशन डिज़ाइनिंग का कोर्स कर रही हूँ।</p>
<p dir="auto">रिया: मेरी छोटी बहन 18 साल - 30-22-30 एक दम पटाखा, नटखट चुलबुली, जुबान कैंची की तरह चलती रहती है अभी MBBS में एडमिशन लिया है, जितना खूबसूरत जिस्म उतना ही तेज़ दिमा</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%9c%e0%a4%bf%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%ae-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b8/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>हवस और बदला</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%b9%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be/</link>
                        <pubDate>Sat, 03 May 2025 07:56:09 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[अपडेट 1रंजीत अपने समय का एक सफल बिजनेसमैन था। पैसों की कभी कोई कमी नहीं आई। एक खुशमिजाज इंसान थे। यह अपने बेटे की बुरी आदतों से हमेशा परेशान रहते। उन्हें लगा अगर जिम्मेदारी मिलेगी तो ठीक हो ...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>अपडेट 1<br /><br />रंजीत अपने समय का एक सफल बिजनेसमैन था। पैसों की कभी कोई कमी नहीं आई। एक खुशमिजाज इंसान थे। यह अपने बेटे की बुरी आदतों से हमेशा परेशान रहते। उन्हें लगा अगर जिम्मेदारी मिलेगी तो ठीक हो जाएगा इसलिए उन्होंने अपने दोस्त की बेटी से इसकी शादी करवा दी।<br /><br />राजेश एक नंबर का ऐय्याश किस्म का इंसान है। इसे हमेशा से सिर्फ पैसे और लड़कियों का नशा है। ना जाने कितनी लड़कियों की जिंदगी खराब कर चुका है। इसका एक खास दोस्त था अभय सिंह। दोनों साथ में हर काम करते। पर राजेश के पास अभय से ज्यादा दौलत थी जिसके वजह से वह हमेशा अभय को नीचा दिखाता। जब अभय की शादी हो गई तो उसने सारे गलत काम बंद कर दिए। अब वह एक शरीफ इंसान बन गया है। इसलिए रंजीत को लगा था कि राजेश भी सुधर जाएगा।<br /><br />संगीता से शादी के बाद उसने पहले तो कुछ ना किया। चुपके-चुपके ऐय्याशी करता। जिसका पता रंजीत को लगा तो उसने सोचा उसने संगीता की जिंदगी बर्बाद कर दी।<br /><br />शादी के 1 साल बाद संगीता माँ बन गई, उसने एक लड़की को जन्म दिया, नेहा। राजेश को इससे कोई मतलब ना था।<br /><br />शादी के 1.5 साल बाद राजेश ने संगीता पर अत्याचार शुरू कर दिया। रोज उसे मारता, बेइज्जत करता। पर संगीता ने कभी कुछ न कहा। एक दिन शराब के नशे में उसने संगीता से जबरदस्ती की जिससे उसकी आत्मा को ठेस पहुँच गई। पर इसके कारण वह फिर से माँ बन गई। और इस बार उसने एक लड़के को जन्म दिया, समीर।<br /><br />रंजीत ने जब समीर को देखा तब उसे बहुत खुशी हुई। नेहा को देखकर भी हुई थी। पर समीर के आने से उसका वंश अब आगे बढ़ता। इधर अभय और उसकी बीवी रागिनी को भी एक बेटी हुई, रितिका।<br /><br />संगीता जब भी समीर को देखती तो उसे वह रात याद आती जब राजेश ने उसके साथ जबरदस्ती की थी। इसलिए वह समीर को उसकी जबरदस्ती की निशानी मानती थी। समीर के 1 साल होने के बाद संगीता ने राजेश को तलाक दे दिया। कोर्ट ने 2 बच्चों को बाँट दिया। जिससे नेहा संगीता के पास आती और समीर राजेश के पास।<br /><br />संगीता को समीर से कोई मतलब ना था। उसे लगा था यह भी अपने बाप की तरह ही होगा। इसलिए वह नेहा को लेकर अपने घर आ गई।<br /><br />रंजीत भी दुखी था लेकिन एक खुशी थी कि समीर उसके पास था।<br /><br />राजेश ने तलाक के दूसरे दिन ही रेशमा से शादी कर ली जिसके साथ यह रोज अपनी हवस मिटाता और शादी भी हवस मिटाने के लिए ही की थी। रेशमा ने आते के साथ ही समीर को टॉर्चर करना शुरू कर दिया। उसे खाना नहीं देती। छोटी-छोटी बात पर मारती। और हमेशा अपने कमरे में ही पड़ी रहती।<br /><br />रंजीत ने एक मेड का इंतजाम किया जो समीर का ख्याल रखती। और उसने अभय और रागिनी को कहकर रितिका को समीर के साथ खेलने के लिए बुला लिया। रितिका और समीर रोज एक-दूसरे के घर जाकर खेलते रहते।<br /><br />समय ऐसे ही निकलता गया। राजेश और रेशमा की एक बेटी हुई, रिया। राजेश भी समीर को मारता रहता। अपना सारा गुस्सा बिना वजह समीर पर उतारता।<br /><br />एक दिन रंजीत किसी काम से बाहर गया था, जब वह वापस आया तब देखा समीर के हाथ में चोट लगी है और खून निकल रहा है और वह रो रहा है। रंजीत ने रेशमा को बुलाया जो अपने कमरे में फोन पर बातें कर रही थी।<br /><br />रंजीत: क्या तुम्हें सुनाई नहीं देता, समीर कबसे रो रहा है। और उसे चोट लगी है।<br /><br />रेशमा: मैं अपने कमरे में फोन पर बात कर रही थी, शायद इसलिए सुनाई नहीं दिया। आप टेंशन ना लो, मैं अभी देखती हूँ।<br /><br />यह बोल रेशमा समीर को कमरे में ले गई। जहाँ उसे दवाई लगाने के बहाने उसे मारती और उसकी चोट पर दबा देती। जिससे समीर और रोने लगता। यह सब रंजीत चुपके देखता है।<br /><br />रंजीत: मेरे जाने के बाद यह हैवान समीर को जान से मार देंगे। मुझे कुछ करना ही होगा।<br /><br />उसने अपना फोन निकाला और अपने दोस्त के बेटे को, जिसे उसने अपना बेटा माना है, उसे कॉल लगाया।<br /><br />थोड़ी देर में वह घर आता है।<br /><br />रंजीत: अशोक, तुम्हें मैंने यहाँ एक जरूरी काम से बुलाया है।<br /><br />अशोक: कहिए ना अंकल, क्या काम है। मैं वह काम जरूर पूरा करूँगा।<br /><br />रंजीत: तुम्हें मेरी जो यह प्रॉपर्टी है, उसे समीर के नाम करनी है। और वह सीक्रेट प्रॉपर्टी भी। क्योंकि अब समीर ही मेरा बदला ले पाएगा। राजेश से तो मुझे अब कोई भी उम्मीद नहीं है। कल अगर मुझे कुछ हो गया तो यह हैवान उस बच्चे को मार देंगे।<br /><br />अशोक: ठीक है अंकल, मैं कर दूँगा।<br /><br />रंजीत: तुम अभी उस सीक्रेट प्रॉपर्टी और बदले के बारे में किसी को कुछ मत बताना, सही समय आने पर तुम खुद समीर से मिलके उसे सब बताना और अभी के लिए यह प्रॉपर्टी उसके नाम करो। और ऐसा नियम बनाओ कि अगर किसी भी तरह समीर को कुछ होता है तो सारी प्रॉपर्टी ट्रस्ट के पास जाएगी और अगर समीर ने अपनी मर्जी से किसी को दिया तो अलग बात है।<br /><br />अशोक: ठीक है अंकल, मैं देख लूँगा।<br /><br />फिर अशोक वहाँ से चला जाता है।</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%b9%e0%a4%b5%e0%a4%b8-%e0%a4%94%e0%a4%b0-%e0%a4%ac%e0%a4%a6%e0%a4%b2%e0%a4%be/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>बिन बुलाया मेहमान</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/</link>
                        <pubDate>Fri, 02 May 2025 18:25:38 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[गगन से मेरी शादी एक साल पहले हुई थी। शादी के बाद कुछ दिन हम गगन के पेरेंट्स के साथ ही रहे भोपाल में। मगर 2 महीने बाद ही हमें दिल्ली आना पड़ा क्योंकि गगन का ट्रांसफर दिल्ली हो गया था। हमने मु...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>गगन से मेरी शादी एक साल पहले हुई थी। शादी के बाद कुछ दिन हम गगन के पेरेंट्स के साथ ही रहे भोपाल में। मगर 2 महीने बाद ही हमें दिल्ली आना पड़ा क्योंकि गगन का ट्रांसफर दिल्ली हो गया था। हमने मुखर्जी नगर में एक घर रेंट पर ले लिया और तब से यहीं पर हैं। मैं भी किसी जॉब की तलाश में हूँ पर कोई आस पास के एरिया में सही जॉब मिल नहीं रही और दिल्ली जैसे शहर में घर से ज्यादा दूर जॉब मैं करना नहीं चाहती।<br /><br />मैंने गगन का नंबर डायल किया। फिर से वो आउट ऑफ कवरेज एरिया आया। पता नहीं कहाँ घूम रहा है गगन। मैं इरिटेट हो कर अपने बेडरूम में आ गई। मैं बहुत हताश थी। कोई जब भी घूमने का प्रोग्राम बनाओ कुछ अजीब ही होता है मेरे साथ। घर की चार दीवारी ही मेरी दुनिया बन गई है। मैं इन खयालों में खोई थी कि अचानक डोर बेल बजी। मेरे चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। मगर मैंने गगन को गुस्सा दिखाने के लिए अपने चेहरे पर आई खुशी छुपा ली। मैंने भाग कर दरवाजा खोला।<br /><br />गगन सामने खड़ा मुस्कुरा राह था।<br /><br />"थोड़ा और लेट आना चाहिए था तुम्हें ताकि मूवी जाने का स्कोप ही खत्म हो जाये।"<br /><br />गगन अंदर आया और दरवाजा बंद करके मुझे बाहों में भर लिया। उसके हाथ मेरे नितंबों पर थे।<br /><br />"क्या कर रहे हो छोड़ो मुझे।"<br /><br />"बहुत प्यारी लग रही हो इस साड़ी में। क्या इरादा है आज।" गगन ने मेरे नितंबों को मसलते हुए कहा।<br /><br />"बातें मत बनाओ मुझे आज हर हाल में मूवी देखनी है।" मैंने गुस्से में कहा।<br /><br />"मूवी भी देख लेंगे पहले अपनी खूबसूरत बीवी को तो देख लें।"<br /><br />"हम लेट हो रहे हैं गगन..."<br /><br />"ओह हाँ..." गगन ने घड़ी की ओर देखते हुए कहा। "मैं 2 मिनट में फ्रेश हो कर आता हूँ। बस 2 मिनट।"<br /><br />"अगर मेरी मूवी छूट गई ना तो देखना। मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"<br /><br />गगन वॉशरूम में घुस गया और 2 मिनट की बजाये पूरे 5 मिनट में बाहर निकला।<br /><br />"सॉरी हनी...चलो चलते हैं।"<br /><br />हमने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाया ही था कि डोर बेल बज उठी।<br /><br />"कौन हो सकता है इस वक्त?" मैंने पूछा।<br /><br />"आओ देखते हैं" गगन ने कहा।<br /><br />गगन ने दरवाजा खोला।<br /><br />हमारे सामने एक कोई 40 साल की उमर का हट्टा कट्टा व्यक्ति खड़ा था। उसके कपड़ों से लगता था कि वो देहाती है। गले में एक गमछा डाल रखा था उसने और सर पर पगड़ी थी उसके। बड़ी बड़ी मूँछे थी उसकी। हम दोनों की तरफ वो कुछ ऐसे मुस्कुरा रहा था जैसे कि बरसों की जान पहचान हो। मुस्कुराते वक्त उसके पीले दांत साफ दिखायी दे रहे थे।<br /><br />"जी कहिए...क्या काम है।"<br /><br />"अरे गग्गु पहचाना नहीं का अपने चाचा को।"<br /><br />"जी नहीं कौन है आप और आप मेरा नाम कैसे जानते हैं।"<br /><br />"अरे बेटा तुम्हारे पापा तुम्हे कई बार हमारे गाँव लेकर आए थे। तुम बहुत छोटे थे। भूल गए क्या वो आम की बगिया में आम तोड़ना चुप चुप कर। अरे हम तुम्हारे राघव चाचा हैं।"<br /><br />गगन को कुछ ध्यान आया और उसने तुरंत चाचा जी के पाँव छू लिए। मेरे तो सीने पर जैसे साँप ही लोट गया। मुझे मूवी का प्रोग्राम बिगड़ता नजर आ रहा था।<br /><br />"चाचा जी ये मेरी बीवी है निधि....निधि पाँव छूवो चाचा जी के।"<br /><br />मेरा उनके पाँव छूने का बिलकुल मन नहीं था पर गगन के कहने पर मुझे पाँव छूने पड़े।<br /><br />"आओ च्चाचा जी अंदर आओ" देहाती मेरी तरफ हँसता हुआ अंदर घुस गया। उसकी हंसी कुछ अजीब सी थी।<br /><br />मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। मैं गुस्से से तिलमिला रही थी। मैं बिना एक शब्द कहे अपने बेडरूम में आ गई। 2 मिनट बाद गगन कमरे में आया और बोला,"सॉरी डार्लिंग आज का प्रोग्राम कैंसिल करना होगा। अब हम घर आये मेहमान को अकेला छोड़ कर तो नहीं जा सकते ना"<br /><br />"मुझे पता था पहले से कि आज भी कोई ना कोई मुसीबत आ ही जायेगी। वैसे है कौन ये देहाती। ना हमारी शादी में देखा इसे ना ही कभी घर चर्चा सुनी इसके बारे में। ये तुम्हारा चाचा कैसे बन गया अचानक।"<br /><br />"अरे सगा चाचा नहीं है। डैडी इसे भाई की तरह ही मानते थे। कई बार गया हूँ इनके गाँव। इन्हें चाचा ही कहता था बचपन में।"<br /><br />"मतलब बहुत दूर की रिश्तेदारी है...वो भी नाम मात्र की। ये यहाँ करने क्या आया है।"<br /><br />"उसके बाल झड़ रहे हैं। उसी के इलाज के लिए दिल्ली आया है। किसी ने इन्हें हमारा पता दे दिया इसलिए यहाँ चला आये"<br /><br />"इसी वक्त आना था इनको...सारा मूड खराब कर दिया मेरा। कब जायेगा ये वापिस।"<br /><br />"ये पूछना अच्छा नहीं लगेगा निधि....जस्ट रिलैक्स। घर आये मेहमान की इज्जत करनी चाहिए। मैं उनके पास बैठता हूँ तुम चाय पानी का बंदोबस्त करो।"<br /><br />"मैं कुछ नहीं करूँगी"<br /><br />"देख लो तुम्हारी अच्छी बहु की इमेज जो तुमने घर पर बनायी थी वो खराब हो जायेगी। इनका डैडी से मिलने जाने का भी प्लान है।" गगन ने मुझे बाहों में भर कर कहा।<br /><br />"ठीक है ठीक है जाओ तुम मैं चाय लाती हूँ।" मैंने ख़ुद को गगन की बाहों से आज़ाद करते हुए कहा।<br /><br />मैं चाय और बिस्किट ले कर गई तो वो देहाती तुरंत मुझे घूरते हुए बोला,<br /><br />"बड़ी सुंदर बहु मिली है तुम्हे बेटा। भगवान तुम दोनों की जोड़ी सलामत रखे।"<br /><br />"शुक्रिया चाचा जी। जो कोई भी निधि को देखता है यही कहता है।" गगन ने मेरी तरफ देखते हुए कहा।<br /><br />"आओ बेटा तुम भी बैठो....तुम्हारी शादी में नहीं आ पाया था। उस वक्त एक मुसीबत में फँसा हुआ था वरना मैं जरूर आता।" उसने मेरी तरफ देखते हुए कहा।<br /><br />"मुझे काम है आप दोनों बाते कीजिए।" मैं कह कर वहाँ से चल दी।<br /><br />"बड़ी शर्मीली दुल्हनिया है तुम्हारी। अच्छी बात है। बेटा बहुत थक गया हूँ। नहा धो कर आराम करना चाहता हूँ।"<br /><br />"बिलकुल चाचा जी। आप नहा लीजिए। तब तक खाना तैयार हो जायेगा। आप खा कर आराम कीजिएगा।"<br /><br />सोचा था कि आज बाहर खायेंगे मगर इस बिन बुलाए मेहमान के कारण मुझे रसोई में लगना पड़ा।<br /><br />जब मैं खाना सर्व कर रही थी डाइनिंग टेबल तो राघव चाचा मुझे घूर कर देख रहा था। उसकी नज़रे मुझे ठीक नहीं लग रही थी।<br /><br />"अरे तुम भी आ जाओ ना।" गगन ने कहा। "हाँ बेटा तुम भी आ जाओ..." चाचा ने घिनौनी सी हंसी हँसते हुए कहा।<br /><br />"नहीं आप लोग खाओ मैं बाद में खा लूँगी। अभी मुझे भूख नहीं है।" मैं कह कर किचन में आ गई।<br /><br />मैंने चुपचाप किचन में ही खाना खा लिया और खाना खा कर नहाने चली गई।<br /><br />बाथरूम में चाचा ने हर तरफ गीला कर रखा था।<br /><br />"बदतमीज कहीं का। हर तरफ पानी बिखेर दिया। फर्श पर साबुन भी पड़ा हुआ है। कोई गिर गया तो।" मैं बड़बड़ाई।<br /><br />नहा कर चुपचाप मैं बेडरूम में घुस गई। गगन ने चाचा के सोने का इंतजाम दूसरे कमरे में कर दिया था।<br /><br />मैं गुस्से में थी और चुपचाप आकर बिस्तर पर लेट गई थी। मेरी कब आँख लग गई मुझे पता ही नहीं चला।<br /><br />मेरी आँख तब खुली जब मुझे अपनी चूचियों पर कसाव महसूस हुआ। मैंने आँखे खोल कर देखी तो पाया कि गगन मेरे उभारों को मसल रहा है।<br /><br />"छोड़ो मुझे नींद आ रही है।"<br /><br />"आओ ना आज बहुत मूड है मेरा।"<br /><br />"पर मेरा मूड नहीं है। तुम्हारे चाचा ने मेरा सारा मूड खराब कर दिया। इन्हें जल्दी यहाँ से दफा करो।"<br /><br />"छोड़ो भी निधि ये सब। लाओ इन्हें चूमने दो।" गगन ने मेरे उभारों को मसलते हुए कहा।<br /><br />मैंने कुछ नहीं कहा और अपनी आँखे बंद कर ली। गगन ने मेरे उभार बाहर निकाल लिए और उन्हें चूमने लगा। मैं खोती चली गई। उसने मुझे बहकते देख मेरा नाड़ा खोल कर मेरी टाँगे अपने कंधे पर रख ली और एक झटके में मुझ में समा गया। मेरे मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी। मैं बहुत धीरे धीरे आवाज़ कर रही थी क्योंकि अब घर में हम अकेले नहीं थे। जब गगन ने स्पीड बहुत तेज़ बढ़ा दी तो मैं ख़ुद को रोक नहीं पाई और मैं जोर-जोर से चीखने लगी<br /><br />"आह्ह्ह....गगन...यस....." गगन ने मेरे मुँह पर हाथ रख लिया और बोला।<br /><br />"श्ह्ह क्या कर रही हो। चाचा जी को सब सुन रहा होगा।"<br /><br />"सॉरी... सब तुम्हारी गलती है। मुझे पागल बना देते हो तुम।"<br /><br />कुछ देर और गगन मेरे अंदर अपने लुंड को बहुत तेज़ी से रगड़ता रहा और फिर अचानक मेरे ऊपर निढाल हो गया। मेरा भी ऑर्गेज्म उसी वक्त हो गया। कुछ देर हम यूँ ही पड़े रहे। कब हमें नींद आ गई पता ही नहीं चला।<br /><br />कोई 12 बजे मेरी आँख खुल गई। गगन मेरे बाजू में पड़ा खर्राटे भर रहा था। मुझे बहुत जोर का प्रेशर लगा हुआ था। मैंने कपड़े पहने बेडरूम से बाहर आ कर दबे पाँव टॉयलेट में घुस गई।<br /><br />जब मैं बाहर निकली तो मेरे होश उड़ गए। टॉयलेट के दरवाजे पर चाचा खड़ा था।<br /><br />"आप यहाँ??" मैंने गुस्से में कहा।<br /><br />"माफ करना बेटी...मुझे लगा कि ग jobban है। इसलिए यहीं खड़ा हो गया।" चाचा ने कहा।<br /><br />मैं नाक...मुँह सिकोड़ कर वहाँ से चल दी।<br /><br />"आआह्ह्ह....खी..खी..खी" चाचा ने हँसते हुए कहा और टॉयलेट में घुस गया।<br /><br />मैंने पीछे मुड़ कर देखा तो मुझे टॉयलेट का बंद दरवाजा ही मिला।<br /><br />"हाय भगवान। मतलब इसने सब सुन लिया। और बेशर्मी तो देखो...कैसे मजाक उड़ा रहा था। मुझे ये बात गगन को बतानी होगी।"<br /><br />अगली सुबह मैं गगन से कोई बात नहीं कर पाई क्योंकि वो बहुत जल्दी में था ऑफिस जाने के लिए। जाते जाते गगन ने चाचा से पूछा, "चाचा जी आप तो हॉस्पिटल कल जायेंगे ना।"<br /><br />"हाँ बेटा आज आराम ही करूँगा। कल जाऊँगा हॉस्पिटल।"<br /><br />मैं अपने दांत भींच कर रह गई। हमारे घर में हमने एक काम वाली लगा रखी थी। वो रोज 10 बजे आकर 11 बजे तक सफाई करके चली जाती थी।<br /><br />उसके जाने के बाद कोई 12 बजे जब मैं किचन में लंच की तैयारी में लग गई।<br /><br />गगन तो टिफिन लेकर जाते थे सुबह। लंच पर वो घर नहीं आते थे। मुझे बस अपने और देहाती चाचा के लिए बनाना था। मैंने चाचा से उसकी पसंद पूछनी जरूरी नहीं समझी। मैंने सोचा बिन बुलाए मेहमान को जितना कम भाव दो उतना ही अच्छा होता है।<br /><br />लंच बनाने के बाद में टॉयलेट में गई तो टॉयलेट सीट पर बैठते वक्त मेरा ध्यान टॉयलेट टैंक पर रखी एक डायरी पर गया। मैंने डायरी उठाई और सीट पर बैठ गई। डायरी खोलते ही जो मैंने पढ़ा मेरे होश उड़ गए।<br /><br />पहले पेज पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था--- "कैसे, कब और कहाँ मैंने किसकी चूत मारी"<br /><br />मैंने ये पढ़ते ही डायरी बंद कर दी। मैं सोच में पड़ गई कि ये किसकी डायरी है। लिखाई गगन की नहीं थी। तभी मेरा ध्यान चाचा पर गया। मैंने मन ही मन कहा, "कमीना कहीं का। देखने से ही लफंगा लगता है।"<br /><br />पर मुझे ना जाने क्या हुआ मैंने डायरी का पन्ना पलटा और पढ़ना शुरू किया। मुझे क्यूरियॉसिटी हो रही थी उसकी करतूतों को जानने की।<br /><br />डायरी से---------<br /><br />मुझे आज भी याद है कैसे मैंने पहली बार चूत मारी थी। उस वक्त मैं कोई 19 साल का था। मुझे ही पता है कितना तड़पता था मैं अपने लुंड को किसी की चूत में डालने के लिए। बहुत कोशिश की मैंने यहाँ वहाँ मगर कोई फायदा नहीं हुआ। जब कोई बात बनती नहीं दिखी तो मेरा ध्यान मेरी भाभी पर गया। जब मेरा ध्यान भाभी पर गया तो मैंने उन्हें ध्यान से देखना शुरू किया। उनकी उमर उस वक्त कोई 30 या 31 की थी। मैंने कई बार उन्हें सोच सोच कर मुठ मारी।<br /><br />भाभी बहुत लाड़ करती थी मेरा। कभी कभी लाड़ में मुझे गले भी लगा लेती थी। दोपहर को जब भाभी सो जाती थी तो मैं छुप छुप कर उसे देखता था।<br /><br />भैया तो खेत में रहते थे सारा दिन। मेरे पास अच्छा मौका था। पर समझ नहीं आता था कि कैसे भाभी को पटाया जाये। मैंने एक प्लान बनाया। भाभी घर से बाहर गई हुई थी। उन्हें दुकान से कुछ सामान लाना था। जब मैंने उन्हें आते देखा तो मैं अपने कमरे में घुस गया और अपना लुंड बाहर निकाल कर उसे हिलाने लगा। साथ ही मुझे कुछ अश्लील बातें भी बोलनी थी। जब भाभी कमरे के पास से गुजरी तो मैंने बोलना शुरू किया।<br /><br />"आह्ह्ह मेरा लुंड कब तक तरसेगा चूत के लिए। मैं कब तक यूँ ही हाथ से हिलाता रहूँगा। काश आज कोई चूत मिल जाये मुझे जिसमें मैं अपना ये लुंड घुसा सकूँ।"<br /><br />भाभी ये सुनते ही मेरे कमरे के बाहर रुक गई। मैंने तुरंत अपना लुंड अंदर किया और दरवाजा खोल कर बाहर आ गया। मैंने नाटक करते हुए कहा, "ओह भाभी आप। आप कब आई।"<br /><br />"किसने सिखाया तुम्हे ये सब?" भाभी ने पूछा।<br /><br />"क्या मतलब मैं कुछ समझा नहीं।" मैंने कहा।<br /><br />"मैंने सब सुन लिया है। किसने सिखाया तुम्हे ये सब।"<br /><br />"भाभी माफ कर दो दुबारा ऐसा नहीं करूँगा। मेरी बहुत इच्छा हो रही थी इसलिए वो सब बोल रहा था।"<br /><br />"अभी से इच्छा होने लगी तुम्हे?"<br /><br />"भाभी भैया को मत बोलना नहीं तो वो मारेंगे।"<br /><br />"किसने सिखाया तुम्हे ये सब।"<br /><br />"पिछले हफ्ते दूसरे गाँव से एक मेहमान आया था मेरे दोस्त के घर। उसी ने बताया कि चूत में लुंड डालने से बहुत मजा आता है। पर मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं किसकी चूत में लुंड डालूँ।" मैंने हिम्मत करके बोल ही दिया क्योंकि मुझ पर हवस सवार थी। ये सुनते ही भाभी ने अपने मुँह पर हाँथ रख लिया।<br /><br />"भाभी क्या आप अपनी चूत में डलवा सकती हैं मेरा। बस एक बार।"<br /><br />"चुप रहो...ऐसी बातें नहीं करते।"<br /><br />"कोई बात नहीं मैं कहीं और तलाश करता हूँ।" कह कर मैं बाहर आ गया।<br /><br />दोपहर को भाभी अपने कमरे में सो रही थी तो मैं चुपचाप उनके कमरे में घुस गया और उनके पीछे लेट गया।<br /><br />"राघव क्या कर रहे हो तुम यहाँ।"<br /><br />"भाभी दे दो ना एक बार। मैं रोज आपको सोच सोच कर मुठ मारता हूँ।"<br /><br />"तो मारते रहो ना। किसने रोका है।"<br /><br />"नहीं अब मुझे असली में मजा लेना है। बस एक बार डलवा लो ना चूत में।"<br /><br />"तुम्हारे भैया को पता चला ना तो मार डालेंगे मुझे।"<br /><br />मुझे बात कुछ बनती नज़र आ रही थी। क्योंकि भाभी ने साफ साफ मना नहीं किया।<br /><br />मैंने बभही की गांड को थाम लिया और उसे सहलाने लगा।<br /><br />"बहुत मस्त गांड है आपकी भाभी।"<br /><br />"हट पागल कैसी बातें करते हो। कुछ नहीं मिलेगा तुम्हे। कहीं और ट्राई करो।"<br /><br />मैं भाभी के ऊपर आ गया और उनकी चूचियों को मसलने लगा। मौका देख कर मैंने भाभी के होठों को भी चूम लिया।<br /><br />"दरवाजा खुला पड़ा है तुम मरवा ओगे मुझे।"<br /><br />"मैं बंद कर देता हूँ। वैसे भी भैया तो शाम को ही आयेंगे।" मैंने उठ कर दरवाजा बंद कर दिया और वापिस भाभी पर चढ़ गया। भाभी ने सलवार कमीज़ पहन रखी थी। मैंने ज्यादा देर करना ठीक नहीं समझा और भाभी का नाड़ा खोलने लगा।<br /><br />"क्या कर रहे हो रुक जाओ। ये सब ठीक नहीं है।" भाभी गिड़गिड़ाई<br /><br />पर मैं रुकने वाला नहीं था। मैंने नाड़ा खोल कर सलवार नीचे सरका कर टाँगों से उतार दी। मैंने भी अपनी पैंट उतार दी और भाभी के ऊपर आ गया। मैंने कभी चूत देखी नहीं थी इसलिए नीचे झुक कर भाभी की चूत को निहारने लगा।<br /><br />चूत पर हलके हलके बाल थे। मैंने अपने लुंड की हाथ में लिया और भाभी की चूत पर रगड़ने लगा।<br /><br />"मेरे प्यारे लुंड ये है चूत जिसके अंदर तुझे घुसना है।" भाभी बहकने लगी थी और उन्होंने अपनी आँखे बंद कर ली थी। अब मैं पूरी आज़ादी से भाभी को यहाँ वहाँ छू रहा था। मुझसे रुका नहीं जा रहा था। मैंने लुंड हाथ में लिया और भाभी की चूत में डालने लगा। पर बहुत कोशिश करने पर भी वो अंदर नहीं गया।<br /><br />भाभी मेरे ऊपर हँसने लगी। "हाहाहा... ऐसे नहीं जायेगा ये अंदर।"<br /><br />"मेरी मदद करो ना फिर...पहली बार चूत देखी है और पहली बार ही चूत मारने जा रहा हूँ।"<br /><br />भाभी ने हाथ बढ़ा कर मेरे लुंड को थाम लिया। लुंड को हाथ में लेते ही वो चीला उठी, "हाय राम ये तो बहुत बड़ा है।"<br /><br />"क्यों मजाक करती हो भाभी। क्या भैया के लुंड से भी बड़ा है।"<br /><br />"हाँ उनके उस से तो ये बहुत बड़ा है।"<br /><br />"ऐसा कैसे हो सकता है भाभी। मैं तो भैया से छोटा हूँ।"<br /><br />"मुझे नहीं पता। पर इतना बड़ा मैंने आज तक नहीं देखा।" भाभी ने मेरे लुंड को देखते हुए कहा।<br /><br />"मतलब आपने भैया के लुंड के अलावा भी दुसरो के लुंड देखे हैं।"<br /><br />"हाँ शादी से पहले 2 लड़कों के देखे थे। उन दोनों के तुम्हारे भैया से बड़े थे पर तुम्हारा तो कोई मुकाबला नहीं। ये तो राक्षस है।"<br /><br />"वो सब तो ठीक है अब इसे अंदर तो ले लो भाभी।"<br /><br />"मुझे डर लग रहा है। इतना बड़ा मैं नहीं ले सकती। मुझे माफ कर दो। मैं हाथ से हिला देती हूँ।"<br /><br />"नहीं हाथ से तो मैं रोज हिला रहा हूँ। आज मुझे चूत के अंदर डालना है इसे।" मैंने लुंड को फिर से भाभी की चूत में डालने की कोशिश की पर फिर से मुझे रास्ता नहीं मिला।<br /><br />मैंने भाभी से बहुत रिक्वेस्ट की तो उन्होंने दुबारा मेरे लुंड को हाथ में लिया और अपनी चूत के छेद पर रख दिया। जब उन्होंने मेरे लुंड को अपनी चूत के छेद पर रखा तो मुझे समझ में आया कि मैं क्यों नहीं घुस्सा पा रहा था। मैं तो हर वक्त उस छेद से ऊपर कोशिश कर रहा था।<br /><br />मैंने जोर का धक्का मारा और भाभी की चीख निकल गई।<br /><br />"ओह्ह्ह्ह....राघव निकाल बाहर बहुत दर्द हो रहा है।"<br /><br />पर मेरे लुंड को पहली बार चूत मिली थी। और बड़ी मुश्किल से चूत में घुसने का रास्ता मिला था। मेरा बाहर निकालने का कोई इरादा नहीं था। मैंने एक और धक्का मारा और थोड़ा और लुंड अंदर सरक गया।<br /><br />"नहीं राघव... आह्ह्ह्ह्ह बहुत दर्द हो रहा है।"<br /><br />मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। मैंने धीरे धीरे अपना पूरा लुंड भाभी की चूत में उतार दिया और फिर बिना रुके धक्के मारने लगा। मैंने सुबह मुठ मारी थी इसलिए जल्दी झड़ने की चिंता नहीं थी। मेरे लुंड को चूत के अंदर होने का बहुत अच्छा अहसास हो रहा था। मैं पूरा बाहर निकाल कर वापिस अंदर डाल रहा था। भाभी अब शीशकिया ले रही थी मेरे नीचे पड़ी हुई। कोई आधे घंटे बाद मैंने अपना पानी छोड़ दिया भाभी के अंदर। इस दौरान भाभी कई बार झड़ चुकी थी। जब मैंने अपना लुंड भाभी की चूत से बाहर निकालने की कोशिश की तो भाभी ने मुझे जकड़ लिया।<br /><br />"राघव इतना मजा कभी नहीं आया।"<br /><br />"ये मजा आपको रोज मिलेगा भाभी। बस भैया को पता ना चलने पाये।"<br /><br />इस तरह मेरे प्यासे लुंड को पहली चूत मिली। भाभी से ही मुझे पता चला कि मेरा लुंड बहुत बड़ा है। ये बात जान कर मुझे ख़ुद पर बहुत गर्व हुआ था। डायरी के ये 2 पेज समाप्त करके जब मैं हटी तो मेरे माथे पर पसीने थे।<br /><br />जींदगी में पहली बार मैंने ऐसा कुछ पढ़ा था। मेरी योनि गीली हो गई थी। फिर अचानक मुझे गुस्सा आ गया कि इस देहाती चाचा ने ये डायरी टॉयलेट में क्यों रख छोड़ी। मैं डायरी टैंक पर ही रख कर बाहर आ गई। मैं किचन की तरफ जा रही थी तो चाचा ने मुझे पीछे से आवाज़ दी, "बेटा मेरी एक डायरी नहीं मिल रही। तुमने देखी क्या कहीं। ब्लू रंग का कवर है उसका।"<br /><br />"मैंने नहीं देखी..." कह कर मैं किचन में आ गई। मैंने चाचा के लिए डाइनिंग टेबल पर खाना रख दिया और अपना खाना लेकर अपने बेडरूम में आ गई।<br /><br />मैंने अपने बेडरूम में ही खाना खाया और खाना खा कर सोने के लिए लेट गई। रोजाना लंच के बाद मुझे सोने की आदत थी। मगर आज आँखों से नींद गायब थी। डायरी में जो कुछ मैंने पढ़ा वो मेरे दिमाग में घूम रहा था।<br /><br />"कैसे कोई इतनी गंदी बातें लिख सकता है। ये देहाती बहुत गंदा है। अपने मन की गंदगी निकाल रखी है इसने डायरी में। पर इसने वो डायरी टॉयलेट में क्यों रख छोड़ी थी। कहीं वो उसे मुझे तो पढ़ाना नहीं चाहता।"<br /><br />ये सोचते ही मेरी आँखों में खून उतर आया। मैं ये सोच कर गुस्से से आग बबूला हो गई कि उसकी हिम्मत कैसे हुई वो डायरी मेरे लिए टॉयलेट में रखने की।<br /><br />फिर मुझे ख़ुद पर गुस्सा आया कि मैंने उसकी डायरी के वो 2-3 पन्ने क्यों पढ़े। सोचते सोचते मेरी आँख लग गई।<br /><br />अचानक मेरे बेडरूम पर हुई दस्तक से मेरी आँख खुल गई। मैंने दरवाजा खोला तो मेरे सामने चाचा खड़ा मुस्कुरा रहा था।<br /><br />"कहिए क्या बात है?" मैंने पूछा।<br /><br />"कुछ नहीं निधि बेटी। मुझे चाय की इच्छा हो रही थी। सोचा तुम्हे बता दूँ। कहीं तुम सो तो नहीं रही।"<br /><br />"जी हाँ मैं सो रही थी।" मैंने गुस्से में कहा।<br /><br />"ओह..फिर तो मैंने गलती कर दी तुम्हे उठा कर।"<br /><br />"घर में दूध नहीं है। इसलिए चाय नहीं बना सकती आपके लिए अभी।"<br /><br />"मुझे काली चाय पसंद है। दूध वाली मैं पीता भी नहीं।" चाचा ने घिनौनी हंसी के साथ कहा।<br /><br />मन तो कर रहा था कि अभी उसके मुँह पर एक थप्पड़ जड़ दूँ पर मैं चुप रही। घर आये मेहमान की बेजती नहीं करना चाहती थी मैं।<br /><br />"ठीक है आप थोड़ा इंतज़ार कीजिए मैं चाय बनाती हूँ।" मैंने कहा।<br /><br />चाचा मुड़ कर जाने लगा मगर जाते जाते अचानक रुक गया और वापिस मेरी तरफ मुड़ कर बोला, "अरे हाँ निधि बेटी वो डायरी मुझे मिल गई थी। टॉयलेट में भूल गया था उसे। तुमने तो देखी होगी वहाँ। कहीं पढ़ तो नहीं ली।"<br /><br />"म...म...मैं क्यों पढ़ूँगी आपकी डायरी। मैंने टॉयलेट में कोई डायरी नहीं देखी थी।" चाचा के अचानक पूछने पर मैं हड़बड़ा गई थी।<br /><br />"हाँ बेटी किसी की निजी डायरी पढ़नी भी नहीं चाहिए।" चाचा कह कर चला गया।<br /><br />मैं अपने पाँव पटक कर रह गई।<br /><br />मैंने गुस्से में काली चाय बना कर चाचा को उनके कमरे में जाकर थमा दी, "ये लीजिए आपकी चाय।"<br /><br />"अरे बहुत जल्दी बना दी। घर के कामों में माहिर हो तुम निधि बेटी। अच्छी बात है। गगन और तुम्हारी जोड़ी बहुत अच्छी है।"<br /><br />"दोपहर को मैं सोई होती हूँ। प्लीज दुबारा मेरा दरवाजा मत खटखटाना"<br /><br />"हाँ हाँ बेटी आगे से ध्यान रखूँगा। बेटी ये लो मेरी डायरी। इसमें मेरे जीवन की कुछ घटनाओं का विवरण है। पढ़ लो और पढ़ कर वापिस दे देना।" चाचा ने गंदी सी हंसी के साथ कहा।</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a4%be%e0%a4%a8/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>चाचा बड़े जालिम हो तुम</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%ae-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae/</link>
                        <pubDate>Tue, 29 Apr 2025 18:22:17 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[भाग 1: कहानी की शुरुआतशबनम खान, 27 साल की एक खूबसूरत शादीशुदा महिला थी। उसकी शादी इकबाल अहमद से 5 साल पहले हुई थी। लेकिन इतने सालों में उनके कोई संतान नहीं हुई। डॉक्टर की जाँच में शबनम की रि...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>भाग 1: कहानी की शुरुआत<br /><br />शबनम खान, 27 साल की एक खूबसूरत शादीशुदा महिला थी। उसकी शादी इकबाल अहमद से 5 साल पहले हुई थी। लेकिन इतने सालों में उनके कोई संतान नहीं हुई। डॉक्टर की जाँच में शबनम की रिपोर्ट तो सामान्य थी, लेकिन इकबाल की रिपोर्ट में पता चला कि उनके शुक्राणुओं की संख्या बहुत कम थी। शबनम की सास, नसीम बी, 62 साल की थीं। उनके पति 12 साल पहले गुजर चुके थे। जब इकबाल की शादी हुई थी, तो नसीम बी बहुत खुश थीं, लेकिन जब सालों बाद भी बहू के कोई बच्चा नहीं हुआ, तो उनकी चिंता बढ़ने लगी। एक दिन जब नसीम बी ने इकबाल की मेडिकल रिपोर्ट पढ़ी, तो उन्हें यकीन हो गया कि उनका बेटा कभी पिता नहीं बन सकता। नसीम बी ने फैसला किया कि वो इस मामले को अपने हाथ में लेंगी। उन्होंने शबनम को सारी सच्चाई बताई और कहा कि वो किसी भी कीमत पर अपने पोते का मुँह देखना चाहती हैं।</p>
<div id="wpfa-64" class="wpforo-attached-file"><img src="https://cdni.pornpics.com/1280/7/782/81896684/81896684_008_2468.jpg" /></div>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%ac%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%87-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%b2%e0%a4%bf%e0%a4%ae-%e0%a4%b9%e0%a5%8b-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%ae/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>बेटी की आग</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%97/</link>
                        <pubDate>Sun, 27 Apr 2025 12:24:54 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[बेटी की आग माँ की राख --1कहानी शुरू होती है दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में, जहाँ रीता और उसकी बेटी सोनिया रहती थीं। रीता, एक 38 साल की औरत, जिसका बदन अभी भी जवानी की आग बरकरार रखता था। उसक...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>बेटी की आग माँ की राख --1<br /><br />कहानी शुरू होती है दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में, जहाँ रीता और उसकी बेटी सोनिया रहती थीं। रीता, एक 38 साल की औरत, जिसका बदन अभी भी जवानी की आग बरकरार रखता था। उसकी गोरी चमड़ी, कसी हुई कमर, और भारी-भारी मम्मे मोहल्ले के मर्दों की नजरों का केंद्र थे। लेकिन रीता का पति, रमेश, ज्यादातर वक्त काम के सिलसिले में बाहर रहता था, जिससे रीता की रातें अक्सर तन्हा और तड़प भरी होती थीं। सोनिया, उसकी 19 साल की बेटी, अभी-अभी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी। उसका कच्चा बदन, पतली कमर, और भोले चेहरे के साथ उभरते मम्मे हर किसी को उसकी तरफ खींचते थे। <br /><br />मोहल्ले में एक नया मेहमान आया था—विकास, 35 साल का एक तेज-तर्रार व्यापारी, जो अंडरगारमेंट्स का बिजनेस करता था। विकास की बातों में जादू था, और उसका मर्दाना बदन और बेशर्मी भरी हंसी औरतों को बेकरार कर देती थी। उसकी दुकान पर रीता अक्सर कपड़े लेने जाती थी, और विकास की नजरें हमेशा रीता के जिस्म को नापती थीं। एक दिन, विकास ने रीता को अपनी दुकान के पीछे वाले कमरे में बुलाया, जहाँ वो नये डिजाइन की ब्रा-पैंटी दिखाने का बहाना बनाता था।<br /><br />“रीता भाभी, ये देखो, ये नया माल आया है, तुम्हारे लिए एकदम फिट,” विकास ने मुस्कुराते हुए कहा, अपनी काली आँखों में चमक लिए। उसने एक लाल रंग की ब्रा रीता की तरफ बढ़ाई।<br /><br />रीता ने शरमाते हुए ब्रा को हाथ में लिया, “विकास, ये तो बहुत बोल्ड है, मैं ऐसी कैसे पहनूँ?” उसकी आवाज में हल्की सी हिचक थी, लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक थी।<br /><br />“अरे भाभी, तुम्हारा ये मस्त बदन ऐसे कपड़ों के लिए ही बना है,” विकास ने रीता की कमर पर हल्के से हाथ रखते हुए कहा। उसका हाथ धीरे-धीरे रीता की गांद की तरफ सरका, और उसने अपने खड़े लंड को रीता के चूतड़ों पर रगड़ना शुरू किया। “सोनिया को भी तो मैंने ऐसी ही ब्रा दी थी, उसने तो बड़े मजे से पहनी।”<br /><br />रीता का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। सोनिया का नाम सुनकर उसे थोड़ा अजीब लगा, लेकिन विकास के मोटे लंड का अहसास उसकी गांद पर होने से उसकी चूत में कुलबुलाहट शुरू हो गई। “सोनिया? उसने कब ली ये?” रीता ने पूछा, उसकी आवाज में थोड़ा गुस्सा और थोड़ी उत्सुकता थी।<br /><br />“अरे भाभी, वो तो पिछले हफ्ते आई थी। मैंने उसकी फिटिंग भी करवाई। बिल्कुल तुम्हारी तरह मस्त बदन है उसका, बस थोड़ा कच्चा है अभी,” विकास ने हंसते हुए कहा, और अपना लंड अब और जोर से रीता की गांद पर रगड़ा। उसने रीता के मम्मों को ब्लाउज के ऊपर से सहलाना शुरू किया। “सच बताऊँ, सोनिया तो मेरे हाथों से ब्रा पहनकर बहुत खुश हुई थी। बोल रही थी कि मम्मी को भी बुलाऊँगी।”<br /><br />रीता को अपनी बेटी की बात सुनकर थोड़ा बुरा लगा, लेकिन विकास के हाथों का जादू उसे बेकरार कर रहा था। उसकी चूत अब गीली होने लगी थी, और वो अपनी गांद को विकास के लंड पर और जोर से दबाने लगी। “विकास, ये सब गलत है... सोनिया अभी छोटी है, और मैं... मैं शादीशुदा हूँ,” रीता ने कमजोर आवाज में कहा, लेकिन उसका जिस्म उसके शब्दों का साथ नहीं दे रहा था।<br /><br />“अरे भाभी, गलत क्या? ये तो जिस्म की आग है, और मैं तो बस इसे ठंडा करने आया हूँ,” विकास ने रीता के ब्लाउज के बटन खोलते हुए कहा। उसने रीता की ब्रा के ऊपर से उसके निपल्स को मसलना शुरू किया। “सोनिया ने तो मेरे साथ पूरी रात मजे किए थे, भाभी। ट्रेन में उसका जिस्म मसलते हुए मैंने उसे सिखाया कि मर्द का लंड कैसे चूसते हैं। तुम भी तो देखो, मेरा लंड कितना तगड़ा है।”<br /><br />रीता का दिमाग सुन्न हो गया। उसकी बेटी के साथ विकास ने ऐसा किया? लेकिन उसकी चूत में उठ रही आग उसे कुछ और सोचने नहीं दे रही थी। विकास ने रीता की साड़ी खींचकर नीचे गिरा दी, और उसकी पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया। अब रीता सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी, और विकास का लंड उसकी गांद पर जोर-जोर से रगड़ रहा था। “विकास, प्लीज... रमेश आ जाएगा, और सोनिया भी घर पर है,” रीता ने आखिरी कोशिश की, लेकिन उसकी आवाज में अब कोई ताकत नहीं थी।<br /><br />“अरे भाभी, रमेश तो चार दिन बाद आएगा, और सोनिया? वो तो मेरे साथ मजे ले चुकी है, अब तेरी बारी है,” विकास ने हंसते हुए कहा। उसने रीता की ब्रा का हुक खोल दिया, और उसके नंगे मम्मे उसके सामने उछल पड़े। “वाह, भाभी, क्या मस्त मम्मे हैं तुम्हारे, बिल्कुल सोनिया जैसे, बस थोड़े भारी।” विकास ने रीता के निपल्स को चूसना शुरू किया, और उसकी पैंटी में हाथ डालकर उसकी गीली चूत को सहलाने लगा।<br /><br />रीता अब पूरी तरह विकास के हवाले थी। उसकी चूत में उंगली घुसते ही वो सिहर उठी। “आह्ह... विकास, ये गलत है... लेकिन... मुझे चाहिए तेरा लंड,” रीता ने बेशर्म होकर कहा। उसने विकास की पैंट के ऊपर से उसके लंड को पकड़ लिया, और उसका मोटापन महसूस करके उसकी आँखें चमक उठीं।<br /><br />“हा, भाभी, यही तो चाहिए था,” विकास ने रीता की पैंटी नीचे खींचते हुए कहा। उसने रीता को दुकान के सोफे पर लिटाया और अपनी पैंट उतार दी। उसका काला, मोटा लंड बाहर निकला, जो रीता की आँखों के सामने लहरा रहा था। “देख, भाभी, ये लंड सोनिया की चूत में भी गया था, और अब तेरी चूत का भोसड़ा बनाएगा।”<br /><br />रीता ने विकास का लंड पकड़कर उसे चूसना शुरू किया। उसका मुँह लंड से भर गया, और वो बड़े मजे से उसे चूस रही थी। विकास ने रीता के बाल पकड़कर उसके मुँह को चोदना शुरू किया। “आह, साली, तू तो सोनिया से भी मस्त चूसती है। बोल, मेरी रंडी भाभी, तुझे मेरा लंड चाहिए?” विकास ने पूछा।<br /><br />“हाँ, विकास, मुझे चाहिए तेरा लंड... चोद डाल मुझे,” रीता ने बेशर्मी से कहा। विकास ने रीता की टाँगें फैलाईं और अपना लंड उसकी चूत पर रगड़ा। फिर एक जोरदार धक्के में उसका आधा लंड रीता की चूत में घुस गया। रीता चिल्लाई, “आह्ह, माआआ... आराम से, विकास... फट जाएगी मेरी चूत!”<br /><br />“साली, अभी तो शुरूआत है,” विकास ने हंसते हुए कहा, और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। रीता के मम्मे उछल रहे थे, और वो विकास को कसकर पकड़कर अपनी चूत चुदवाने लगी। “हाँ, विकास, चोद... और जोर से... मेरी चूत को फाड़ डाल,” रीता ने मोन करते हुए कहा।<br /><br />विकास ने रीता को आधे घंटे तक चोदा, और फिर उसकी चूत में अपना पानी छोड़ दिया। “ले, भाभी, ये मेरा बच्चा ले, और अपने पति को बोल देना कि ये उसका है,” विकास ने हंसते हुए कहा। रीता निढाल होकर सोफे पर पड़ी थी, उसका जिस्म पसीने से तर और चूत विकास के पानी से गीली थी।<br /><br />विकास ने रीता को नई ब्रा-पैंटी दीं और कहा, “भाभी, ये गिफ्ट है मेरी तरफ से। और हाँ, सोनिया को बोलना कि अगली बार वो भी आए। मैं तुम माँ-बेटी को हर महीने 50,000 रुपये दूँगा, बस मेरी रंडी बनकर रहो।”<br /><br />रीता ने कुछ नहीं कहा, बस शरमाते हुए कपड़े पहने और घर चली गई। लेकिन उसकी चूत में अभी भी विकास के लंड की आग जल रही थी।<br /><br />---<br /><br />बेटी की आग माँ की राख --2<br /><br />कुछ महीने बाद, विकास का बिजनेस और तेजी से चलने लगा। उसने अब मोहल्ले की दूसरी औरतों को भी अपने जाल में फँसाना शुरू कर दिया। इस बार उसकी नजर थी रीता की सहेली, मंजू, पर। मंजू, 36 साल की एक शादीशुदा औरत, जिसका पति एक सरकारी नौकरी में था और अक्सर घर से बाहर रहता था। मंजू का बदन रीता से भी ज्यादा कसा हुआ था—गोरी चमड़ी, गोल-गोल मम्मे, और टाइट गांद जो साड़ी में और भी उभरती थी। विकास ने मंजू को अपनी दुकान पर बुलाया, ये कहकर कि उसने उसके लिए खास डिजाइन की ब्रा-पैंटी मँगवाई हैं।<br /><br />“मंजू भाभी, तुम्हारे लिए ये स्पेशल माल लाया हूँ, देखो,” विकास ने एक काली ब्रा मंजू की तरफ बढ़ाई। उसकी आँखें मंजू के जिस्म को नाप रही थीं।<br /><br />मंजू ने हँसते हुए कहा, “विकास, तू भी ना, हमेशा ऐसी बोल्ड चीजें लाता है। मैं ये कैसे पहनूँ?” लेकिन उसकी हँसी में एक छुपी हुई उत्सुकता थी।<br /><br />“अरे भाभी, तुम्हारा ये मस्त बदन तो ऐसी चीजों के लिए ही बना है,” विकास ने मंजू की कमर पर हाथ रखते हुए कहा। उसने मंजू को दुकान के पीछे वाले कमरे में ले जाकर दरवाजा बंद कर दिया। “रीता भाभी ने तो मेरे हाथों से ब्रा-पैंटी पहनकर बहुत मजे लिए थे। बोलो, तुम भी ट्राई करोगी?”<br /><br />मंजू का चेहरा लाल हो गया। “रीता ने ऐसा किया? विकास, ये सब गलत है... मैं शादीशुदा हूँ, और तू मुझे भाभी बोलता है,” मंजू ने कहा, लेकिन उसकी आवाज में कमजोरी थी।<br /><br />विकास ने मंजू की साड़ी के पल्लू को हल्के से खींचा और उसकी कमर पर अपना लंड रगड़ना शुरू किया। “भाभी, ये भाई-भाभी का रिश्ता तो बस नाम का है। असली रिश्ता तो जिस्म से जिस्म का होता है,” विकास ने कहा, और मंजू के ब्लाउज के बटन खोलने लगा। उसने मंजू की ब्रा के ऊपर से उसके मम्मों को मसलना शुरू किया। “देख, मंजू भाभी, तेरा ये बदन तो रीता से भी मस्त है। तेरे पति को तो हर रात मजा आता होगा ना?”<br /><br />मंजू की साँसें तेज हो गईं। विकास का मोटा लंड उसकी गांद पर रगड़ रहा था, और उसकी चूत में आग लगने लगी थी। “विकास, प्लीज... ये गलत है... मेरा पति... और लोग देख लेंगे,” मंजू ने कमजोर आवाज में कहा।<br /><br />“अरे भाभी, कौन देखेगा? और तेरा पति तो बाहर है। चल, मेरे सामने अपनी ब्रा-पैंटी उतार, मैं तुझे नई फिटिंग करवाता हूँ,” विकास ने मंजू की साड़ी पूरी तरह खींचकर नीचे गिरा दी। उसने मंजू की पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया, और अब मंजू सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी।<br /><br />मंजू की चूत गीली हो चुकी थी। विकास ने उसकी पैंटी में हाथ डालकर उसकी चूत को सहलाना शुरू किया। “वाह, मंजू भाभी, तेरी चूत तो पहले से गीली है। बोल, मेरे लंड की प्यासी है ना तू?” विकास ने पूछा, और अपनी पैंट उतार दी। उसका मोटा, काला लंड मंजू के सामने लहरा रहा था।<br /><br />मंजू ने विकास का लंड देखकर अपनी आँखें बंद कर लीं, लेकिन उसका जिस्म बेकरार था। “विकास, प्लीज... मुझे शर्म आ रही है... मैंने कभी अपने पति के अलावा किसी को नहीं देखा,” मंजू ने कहा, लेकिन उसने विकास का लंड पकड़ लिया और उसे सहलाने लगी।<br /><br />“शर्माना छोड़, मेरी रंडी भाभी,” विकास ने मंजू की ब्रा खींचकर फाड़ दी। उसने मंजू के निपल्स को चूसना शुरू किया और उसकी पैंटी नीचे खींच दी। “देख, तेरी चूत तो मेरे लंड के लिए तरस रही है। बोल, चुदवाएगी मुझसे?”<br /><br />मंजू अब पूरी तरह बेशर्म हो चुकी थी। “हाँ, विकास, चोद डाल मुझे... मुझे चाहिए तेरा लंड,” मंजू ने मोन करते हुए कहा। विकास ने मंजू को कमरे के बेड पर लिटाया और उसकी टाँगें फैलाईं। उसने अपना लंड मंजू की चूत पर रगड़ा और फिर एक जोरदार धक्के में पूरा लंड अंदर घुसा दिया।<br /><br />“आह्ह, माआआ... विकास, आराम से... फट जाएगी मेरी चूत,” मंजू चिल्लाई।<br /><br />“साली, अभी तो तेरी चूत का भोसड़ा बनाना है,” विकास ने हंसते हुए कहा, और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। मंजू के मम्मे उछल रहे थे, और वो विकास को कसकर पकड़कर अपनी चूत चुदवाने लगी। “हाँ, विकास, चोद... और जोर से... मेरी चूत को फाड़ डाल,” मंजू ने मोन करते हुए कहा।<br /><br />विकास ने मंजू को आधे घंटे तक चोदा, और फिर उसकी चूत में अपना पानी छोड़ दिया। “ले, मंजू भाभी, ये मेरा बच्चा ले। और हाँ, रीता और सोनिया की तरह तू भी मेरी रंडी बन,” विकास ने कहा। उसने मंजू को नई ब्रा-पैंटी दीं और कहा, “ये गिफ्ट है मेरी तरफ से। और हाँ, अगली बार अपनी कोई सहेली को भी लाना।”<br /><br />मंजू निढाल होकर बेड पर पड़ी थी। उसका जिस्म पसीने से तर और चूत विकास के पानी से गीली थी। उसने कपड़े पहने और शरमाते हुए घर चली गई। लेकिन उसकी चूत में विकास के लंड की आग अभी भी जल रही थी। विकास ने मन में सोचा, “ये मोहल्ला तो मेरे लिए जन्नत है। रीता, सोनिया, और अब मंजू... अगली बारी किसकी होगी?”<br /><br />क्रमशः...</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%ac%e0%a5%87%e0%a4%9f%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%86%e0%a4%97/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>रेलगाड़ी की रात</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4/</link>
                        <pubDate>Sun, 27 Apr 2025 11:09:49 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[ये कहानी लगभग एक साल पुरानी है। हमारे रिश्तेदारों में किसी की मृत्यु हो गई थी। मेरे पति अपने काम में व्यस्त थे, इसलिए मुझे अकेले ही वहाँ जाना पड़ा। सफर ट्रेन का था, और मेरे पति ने मेरे लिए प...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>ये कहानी लगभग एक साल पुरानी है। हमारे रिश्तेदारों में किसी की मृत्यु हो गई थी। मेरे पति अपने काम में व्यस्त थे, इसलिए मुझे अकेले ही वहाँ जाना पड़ा। सफर ट्रेन का था, और मेरे पति ने मेरे लिए प्रथम श्रेणी एसी में सीट बुक करवा दी थी, ताकि मुझे कोई परेशानी न हो।<br /><br />ट्रेन रात दस बजे की थी। मेरे पति मुझे स्टेशन तक छोड़ने आए और मेरे कूपे में बिठाकर टिकट चेकर से मिलने चले गए। मेरा कूपा दो सीटों वाला था, और अभी तक दूसरी सीट खाली थी। मैंने अपना सामान ठीक किया और पति का इंतज़ार करने लगी।<br /><br />थोड़ी देर बाद मेरे पति लौटे, उनके साथ एक काले कोट में एक नौजवान था। वह टिकट चेकर था, जिसकी उम्र करीब छब्बीस साल रही होगी। गोरा रंग, लगभग पौने छह फीट लंबा, और देखने में बेहद आकर्षक। मेरे पति ने उससे मेरा परिचय करवाया। उसका नाम अमित था। वह न सिर्फ़ सुंदर था, बल्कि बातचीत में भी शालीन लग रहा था।<br /><br />उसने मुझसे कहा, "मैडम, आप चिंता न करें। मैं इसी कोच में हूँ। कोई परेशानी हो तो मुझे बता दीजिएगा, मैं तुरंत हाज़िर हो जाऊँगा। आपकी साथ वाली बर्थ खाली है, और अगर कोई आएगा भी तो सिर्फ़ कोई महिला ही होगी। आप निश्चिंत होकर सो सकती हैं।"<br /><br />उसकी बातों से मुझे और मेरे पति को राहत मिली। ट्रेन चलने का समय हो गया था, तो मेरे पति नीचे उतर गए। जैसे ही वे उतरे, ट्रेन चल पड़ी। मैंने खिड़की से उन्हें अलविदा कहा और अपनी सीट पर आराम से बैठ गई।<br /><br />दोस्तों, उस दिन मुझे अपने पति से दूर जाने का बिल्कुल मन नहीं था। वजह थी कि मेरी माहवारी खत्म हुए सिर्फ़ एक दिन बीता था, और ऐसे दिनों में जिस्म की भूख कितनी बढ़ जाती है, ये तो आप सब जानते ही हैं। मैं अपने पति के साथ जी भरकर वक्त बिताना चाहती थी, लेकिन मजबूरी में मुझे ये सफर करना पड़ रहा था। मन उदास था।<br /><br />तभी कूपे में अमित आया। उसने कहा, "मैडम, आप गेट बंद कर लीजिए। मैं थोड़ी देर में आता हूँ, तब आपका टिकट चेक कर लूँगा।" <br /><br />उसके जाने के बाद मैंने सोचा कि रात का सफर लंबा है, क्यों न कपड़े बदल लूँ। साड़ी में मुझे नींद नहीं आती। मैंने सूटकेस खोला, लेकिन अफ़सोस! जल्दबाजी में मैं गाउन का ऊपरी जालीदार हिस्सा तो ले आई थी, पर अंदर पहनने वाला हिस्सा घर पर ही छूट गया था। जो मेरे पास था, वह पूरी तरह पारदर्शी था, जिसमें से सब कुछ दिखता था।<br /><br />दो मिनट सोचने के बाद मेरी वासना ने मुझे एक साहसी फैसला लेने पर मजबूर कर दिया। मैंने सोचा, क्यों न इस सुंदर नौजवान से कुछ मज़ा लिया जाए? ये ख़याल आते ही मैंने वो जालीदार गाउन निकाला और अपनी साड़ी, ब्लाउज़, और पेटीकोट उतार दिए।<br /><br />अब मेरे शरीर पर सिर्फ़ लाल रंग की ब्रा और पैंटी थी। ऊपर से मैंने वो सफ़ेद जालीदार गाउन पहन लिया, जो नाम का ही गाउन था—उसमें से सब कुछ साफ़ नज़र आ रहा था। और मज़े की बात ये कि मेरी ब्रा और पैंटी भी जालीदार थीं, जिससे मेरे चूचुक तक बाहर से दिख रहे थे। आईने में खुद को देखकर मैं ख़ुद गरम हो गई।<br /><br />तैयारी पूरी करके मैं सीट पर लेट गई और एक मैगज़ीन पढ़ते हुए अमित का इंतज़ार करने लगी। पाँच मिनट बीत गए, तो मैंने सोचा कि पहले खाना खा लूँ। मैंने घर से लाया हुआ खाना निकाला और खाने लगी। खाते वक्त मुझे ख़याल आया कि अगर बीच में अमित टिकट चेक करने आ गया, तो मुझे उठकर टिकट निकालना पड़ेगा। इसलिए मैंने पर्स से टिकट निकाल लिया।<br /><br />टिकट हाथ में आते ही मेरे दिमाग में अमित का जवान जिस्म घूम गया। मेरे अंदर की औरत जाग उठी। मैंने पहले से ही पारदर्शी कपड़े पहने थे, और अब मैंने टिकट को अपनी ब्रा में, अपने बड़े-बड़े बूब्स के बीच डाल दिया। टिकट मेरे बाएँ निप्पल के पास से साफ़ दिख रहा था।<br /><br />तभी कूपे का दरवाज़ा खुला और अमित अंदर आया। मुझे इस हाल में देखकर वह हक्का-बक्का रह गया। पसीना छूटने लगा, और वह इधर-उधर देखने लगा। मैंने उसका हौसला बढ़ाने के लिए मुस्कुराकर कहा, "आइए, अमित जी, बैठिए। खाना लेंगे?"<br /><br />वह हड़बड़ाते हुए बोला, "न-न-नहीं मैडम, आप खाइए। मैं तो बस टिकट चेक करने आया था। कोई बात नहीं, मैं बाद में आ जाऊँगा।" <br /><br />मैंने उसे सामने वाली सीट पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, "नहीं-नहीं, आप बैठिए। मैं अभी टिकट दिखाती हूँ।" <br /><br />मैंने खाने का डिब्बा नीचे रखा और टिकट ढूँढने का नाटक करने लगी। बार-बार नीचे झुक रही थी, ताकि वह मेरी छातियाँ अच्छे से देख सके। दोस्तों, मेरे बूब्स की तारीफ़ तो आप सब जानते ही हैं—किसी को भी दीवाना बना सकते हैं।<br /><br />मैं चाहती थी कि वह ख़ुद मेरे बूब्स में रखे टिकट को देख ले, और ऐसा ही हुआ। उसने इशारा करते हुए कहा, "मैडम, लगता है आपका टिकट आपके ब्लाउज़ में है।"<br /><br />मैंने नाटक करते हुए गले की ओर देखा और हँसते हुए कहा, "कहाँ यार, मैंने ब्लाउज़ पहना ही कहाँ है? ये तो ब्रा में रखा है।" फिर मैंने खाने से सने हाथों से टिकट निकालने की नाकाम कोशिश की, बार-बार उंगलियाँ डालकर उसे अपने बूब्स दिखाती रही।<br /><br />जब टिकट और अंदर चला गया, तो मैंने मुस्कुराकर कहा, "सॉरी यार, अब तो आपको ही मेहनत करनी पड़ेगी।" <br /><br />वह तुरंत मेरे पास आया और मेरे गाउन में हाथ डालते हुए बोला, "क्यों नहीं मैडम, मैं निकाल लूँगा!" उसकी मुस्कान शरारती थी। उसने डरते-डरते हाथ अंदर डाला, लेकिन टिकट मेरे निप्पल के ऊपर अटक गया। अब उसे ब्रा में हाथ डालना ही था।<br /><br />वह हिचक रहा था, तो मैंने कहा, "हाँ-हाँ, ब्रा में हाथ डालकर निकाल लीजिए न!" मेरी बात सुनते ही उसके हौसले बढ़ गए। उसने पूरा हाथ मेरी ब्रा में डाला। टिकट मिला, लेकिन साथ में मेरी चूची भी उसके हाथ में आ गई। वह शरारती हो गया और मेरी चूची को सहलाने-मसलने लगा।<br /><br />मैं तो यही चाहती थी। मैंने उसकी ओर देखकर मुस्कुराया। वह और जोश में आ गया और ज़ोर से मेरी चूची दबाने लगा। फिर उसने टिकट निकाला, चेक किया, और आँख मारते हुए बोला, "आप खाना खा लीजिए, मैं बाकी यात्रियों को चेक करके आता हूँ।"<br /><br />मैंने जवाब दिया, "जल्दी आना!" वह मुस्कुराता हुआ चला गया।<br /><br />मैंने जल्दी-जल्दी खाना खत्म किया और उसका बेसब्री से इंतज़ार करने लगी। वह भी उतना ही उतावला था, और पाँच-सात मिनट में लौट आया। अंदर आते ही उसने कूपे को लॉक किया और मुझे अपनी बाँहों में भरते हुए बोला, "आओ सोनाली, आज तुम्हें फर्स्ट एसी का पूरा मज़ा दिलाता हूँ।"<br /><br />मैंने उसकी गर्दन में हाथ डाले और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। अगले ही पल हम एक-दूसरे के होंठ चूस रहे थे। वासना की आग भड़क उठी। मेरी जीभ उसके मुँह में चली गई, और वह उसे प्यार से चूसने लगा।<br /><br />उसका दायाँ हाथ मेरी चूची पर था, और मुझे मज़ा आने लगा था। करीब दो-तीन मिनट की चुम्माचाटी के बाद वह अलग हुआ और बोला, "सोनाली, एक समस्या है।"<br /><br />"क्या हुआ?" मैंने पूछा।<br /><br />"मेरा एक साथी, विकास, इसी कोच में है। अगर मैं ज़्यादा देर गायब रहा, तो वह मुझे ढूँढते हुए यहाँ आ जाएगा। क्या उसे बुला लूँ?"<br /><br />मेरे मन में लड्डू फूटे। दो-दो मर्द! मैंने तुरंत कहा, "हाँ-हाँ, बुला लो। लेकिन किसी और को पता न चले। जल्दी जाओ।"<br /><br />वह बाहर गया और कुछ मिनट बाद विकास के साथ लौटा। विकास करीब पैंतीस साल का था, काला रंग, थोड़ा मोटा, लेकिन ठीक-ठाक दिखता था। मैंने सोचा, चलो, दो लंड से मेरी प्यास बुझ ही जाएगी।<br /><br />उन्होंने कूपे लॉक किया और मेरे पास आकर खड़े हो गए। अमित ने परिचय करवाया, "ये मेरा दोस्त विकास है।"<br /><br />मैंने विकास से हाथ मिलाया और अमित से कहा, "तुमने तो अपना नाम भी नहीं बताया।"<br /><br />वह हँसा, "मैं अमित हूँ। आप मुझे अमी भी बुला सकती हैं।" <br /><br />मैंने कहा, "अमी, अच्छा नाम है। लेकिन ये मैडम-मैडम क्या है? मेरा नाम सोनाली है। तुम मुझे कोई सेक्सी नाम से भी बुला सकते हो।"<br /><br />परिचय के बाद हम खुल गए। वे शरमा रहे थे, तो मैंने पहल की। मैंने अमित के गले में हाथ डालकर उसके होंठ चूसने शुरू कर दिए। वह मेरी कमर पकड़कर मुझे चूमने लगा। विकास खड़ा देख रहा था। मैंने उसे पास बुलाकर उसकी पैंट के ऊपर से लंड पर हाथ फेरा।<br /><br />कुछ देर हम खड़े-खड़े चूमते रहे। कभी अमित मेरे होंठ चूमता, तो कभी विकास मेरी गर्दन पर दाँत गड़ाता। मैंने उनके लंडों को सहलाकर उन्हें उकसाया।<br /><br />जब वे गरम हुए, तो उन्होंने मुझे सीट पर लिटाया। अमित मेरे होंठ चूसने और चूचियों से खेलने लगा, जबकि विकास ने मेरी पैंटी उतारकर मेरी चूत चाटना शुरू कर दिया।<br /><br />मुझे मज़ा आने लगा, लेकिन उनके कपड़े अभी तक नहीं उतरे थे। मैंने कहा, "रुक जाओ यार, सिर्फ़ मेरे ही कपड़े उतारोगे? अपने हथियार भी तो दिखाओ।"<br /><br />विकास ने अपने कपड़े उतारे और अपना लंड मेरे मुँह के पास लाया। उसका लंड काला, छह इंच लंबा, और तीन इंच मोटा था। मैंने सोचा, ये मेरी गांड के लिए परफेक्ट है। मैंने उसे मुँह में लेने की कोशिश की, पर मोटाई की वजह से मुश्किल हुई। फिर मैंने जीभ से चाटना शुरू किया। उसका स्वाद नारियल पानी जैसा था।<br /><br />इधर अमित ने भी कपड़े उतारे। उसका लंड सात इंच लंबा, दो इंच मोटा, और गोरा था। मैंने उसे मुँह में लिया, और विकास मेरी चूत चाटने लगा। ट्रेन की रफ़्तार और हमारा जोश—सब मिलकर माहौल गरम कर रहे थे।<br /><br />अमित मेरे मुँह में धक्के देने लगा और जल्द ही झड़ गया। मैंने उसका सारा रस पी लिया। विकास भी थक गया था। उसने कहा, "मेरा भी चूसो।" <br /><br />मैंने हँसकर कहा, "सब मेरे मुँह में ही झड़ोगे, तो मेरी चूत का क्या?" <br /><br />वह बोला, "चिंता मत करो, मैं तेरी चूत में ही पानी डालूँगा।" फिर उसने मुझे कुतिया बनाया और मेरी चूत में लंड डाला। चुदाई शुरू हुई।<br /><br />अमित ने कपड़े पहने और विकास से कुछ कहा, फिर बाहर चला गया। मुझे चुदाई में मज़ा आ रहा था, तो मैंने ध्यान नहीं दिया। विकास ने मेरी गांड में लंड डालने की कोशिश की। पहली बार फिसला, दूसरी बार अंदर गया। दर्द से मेरी चीख निकली, लेकिन बाद में मज़ा आने लगा।<br /><br />तभी कूपे का दरवाज़ा खुला और तीन लोग अंदर आए। ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी थी। मैं घबरा गई और कपड़े ढकने लगी। विकास ने कहा, "ये मेरे दोस्त हैं। तुम्हारी चूत की प्यास बुझाने आए हैं।"<br /><br />मुझे गुस्सा आया। मैंने कहा, "मुझे रंडी समझा है? बाहर निकलो, वरना शोर मचाऊँगी।"<br /><br />वे डर गए और माफी माँगने लगे। मैंने सोचा, अब इन्होंने मुझे देख ही लिया है, और मेरी प्यास भी बाकी है। मैंने कहा, "ठीक है, आधा घंटा है। जल्दी करो और चले जाओ।"<br /><br />वे चारों मेरे पास आए। दो ने मेरे बूब्स दबाए, एक ने चूत चाटी, और विकास ने अपना लंड मेरे मुँह में डाला। मैं फिर गरम हो गई। विकास ने मेरी गांड मारी, एक ने चूत में लंड डाला। बाकी दो मेरे मुँह के पास थे।<br /><br />मैं अपने चरम पर पहुँची। विकास झड़ गया, फिर दूसरा भी। आखिरी बचा राकेश था। उसका लंड मोटा और ताकतवर था। उसने मेरी चूत को ज़ोर-ज़ोर से चोदा। मैं कई बार झड़ी। आखिर में उसने अपना रस मेरे मुँह में डाला। स्वाद लाजवाब था।<br /><br />तो दोस्तों, ये थी मेरी "रेलगाड़ी की रात"। अगली बार और मज़ेदार कहानी के लिए तैयार रहें।<br /><br />तुम्हारी प्यारी सोनाली।</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%b0%e0%a5%87%e0%a4%b2%e0%a4%97%e0%a4%be%e0%a4%a1%e0%a4%bc%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%80-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>पहलवान का प्यार</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/</link>
                        <pubDate>Sun, 27 Apr 2025 10:52:53 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[ये कहानी एक गरीब लड़की की है, जिसका नाम राधा था। राधा एक गरीब परिवार से थी, उसके माता-पिता मजदूरी करते थे। राधा की दो बहनें थीं, सीता और गीता। सीता और गीता दोनों ही दिखने में बहुत सुंदर और स...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>ये कहानी एक गरीब लड़की की है, जिसका नाम राधा था। राधा एक गरीब परिवार से थी, उसके माता-पिता मजदूरी करते थे। राधा की दो बहनें थीं, सीता और गीता। सीता और गीता दोनों ही दिखने में बहुत सुंदर और स्मार्ट थीं, लेकिन राधा उतनी आकर्षक नहीं थी। वह छोटे कद की और दुबली-पतली थी, जिसके कारण वह खुद को हमेशा कमतर महसूस करती थी। राधा की उम्र 25 साल थी, लेकिन वह 20 साल की लगती थी। उसकी बहनें हमेशा लड़कों का ध्यान आकर्षित करती थीं, जबकि राधा को कोई नहीं देखता था। राधा मन ही मन में अपनी किस्मत को कोसती रहती थी।<br /><br />पड़ोस का पहलवान<br /><br />उनके पड़ोस में एक पहलवान रहता था, जिसका नाम विक्रम था। विक्रम एक हट्टा-कट्टा, 6 फुट का आदमी था, जो अपने अखाड़े में कुश्ती का अभ्यास करता था। राधा की दोनों बहनें, सीता और गीता, विक्रम के साथ गुप्त संबंध रखती थीं। एक रात, जब राधा की नींद खुली, तो उसने देखा कि उसकी बहनें घर में नहीं हैं। उसे शक हुआ कि वे विक्रम के पास गई होंगी। वह चुपके से अखाड़े की ओर गई और वहाँ से अपनी बहनों और विक्रम की आवाजें सुनीं। वे अंतरंग बातें कर रहे थे। सीता की चीखने की आवाज आई, "आआआह्ह्ह उउउउउ," फिर गीता बोली, "विक्रम, और जोर से, तुम्हारा लंड बहुत बड़ा है, मुझे बहुत मजा आ रहा है।" सीता ने कहा, "धीरे बोलो, कहीं राधा जाग न जाए।" विक्रम हँसा और बोला, "अरे, उसे भी आने दो, मैं उसे भी चोद डालूँगा। एक न एक दिन तो उसे भी चखना ही है।"<br /><br />यह सुनकर राधा के मन में एक अजीब सी गर्मी और खुशी हुई। आज तक किसी ने उसके बारे में इस तरह नहीं सोचा था। वह चुपचाप घर लौट आई और सोने की कोशिश करने लगी, लेकिन नींद नहीं आई। उसके दिमाग में बार-बार विक्रम की बातें घूम रही थीं—उसका लंड कैसा होगा, उसकी बहनें उसे कैसे लेती होंगी? राधा ने पहले कभी किसी मर्द को छुआ नहीं था, बस लड़कों को पेशाब करते देखा था और लंड के बारे में सुना था। उसने अपनी सलवार का नाड़ा खोला और हाथ अपनी चूत पर ले गई। उसकी चूत इतनी गीली थी जितनी पहले कभी नहीं हुई थी। उसने उंगली अंदर डाली और आगे-पीछे करने लगी। उसे मजा आने लगा और थोड़ी देर में वह झड़ गई। पानी निकलते ही वह थोड़ा शांत हुई और सो गई।<br /><br />राधा की बेचैनी<br /><br />अगले दिन सुबह जब राधा जागी, तो उसे रात की बातें याद आईं। नहाते वक्त उसने फिर से उंगली से खुद को संतुष्ट किया। वह अपनी बहनों को कुछ नहीं बताना चाहती थी। कॉलेज गई, लेकिन उसका ध्यान पढ़ाई में नहीं, विक्रम पर था। कई दिन तक यह सिलसिला चला—वह रात को अपनी बहनों की रासलीला चुपके से सुनती और फिर उंगली से अपनी आग बुझाती। राधा का डर, जो उसके छोटे कद और दुबलेपन की वजह से था, अब कम हो गया था। उसे लगने लगा था कि कोई उसे चाहता है।<br /><br />एक दिन विक्रम से उसकी मुलाकात हुई। वह कॉलेज से लौट रही थी, जब विक्रम ने उससे हाल-चाल पूछा। राधा की धड़कनें तेज हो गईं, लेकिन वह कुछ नहीं बोली और घर चली गई। उसके दिल में विक्रम के लिए प्यार जाग चुका था।<br /><br />मौका मिलना<br /><br />कुछ दिनों बाद, राधा के परिवार को उसके मामा की शादी के लिए आठ दिन के लिए जाना पड़ा। लेकिन राधा की परीक्षाएँ चल रही थीं, इसलिए वह नहीं जा सकी। उसकी देखभाल के लिए उसकी दादी रुक गईं। दादी की उम्र ज्यादा थी, और वह रात में ज्यादा नहीं सोती थीं। एक रात, राधा का मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था। वह विक्रम के अखाड़े की ओर जाना चाहती थी, लेकिन दादी जाग गईं और उसे सोने को कहा।<br /><br />अगले दिन, परीक्षा देकर लौटते वक्त, राधा की फिर से विक्रम से मुलाकात हुई। उसने पूछा, "पेपर कैसा हुआ?" राधा बोली, "ठीक था। कल अकाउंट का पेपर है।" विक्रम ने कहा, "मेरे अखाड़े में कुछ अकाउंट के नोट्स हैं, रात को आकर ले जाना।" राधा ने कुछ नहीं कहा और घर चली गई। लेकिन जैसे-जैसे रात हुई, उसका मन मचलने लगा। उसे दादी का भी ख्याल था। फिर उसकी नजर दादी की दवाइयों पर पड़ी, जिसमें नींद की गोलियाँ थीं। उसने दादी को पानी में दो गोलियाँ मिलाकर दे दीं। दादी गहरी नींद में सो गईं।<br /><br />रात का मिलन<br /><br />रात के 12:30 बज चुके थे। मोहल्ले में सन्नाटा था। राधा ने अखाड़े के दरवाजे पर दस्तक दी। विक्रम ने दरवाजा खोला और उसे अंदर ले गया। अखाड़े में अंधेरा था, और राधा को चलने में दिक्कत हो रही थी। विक्रम ने पूछा, "गोद में उठा लूँ?" राधा चुप रही। उसने उसे गोद में उठाया और पीछे के कमरे में ले गया। वहाँ उसने राधा को खड़ा किया और बोला, "नोट्स यहीं हैं।" लेकिन अंधेरे में विक्रम ने अपने कपड़े उतार दिए और राधा से टकरा गया। उसने राधा का हाथ अपने लंड पर रख दिया। राधा ने पहली बार किसी मर्द के लंड को छुआ। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।<br /><br />विक्रम ने राधा की सलवार का नाड़ा खोला और उसका टॉप उतार दिया। राधा नंगी हो गई। विक्रम ने उसकी गीली चूत देखी और बोला, "तैयार तो पहले से थी।" राधा चुप रही। विक्रम ने उसे नीचे सुलाया। उसका लंड बड़ा और सख्त था। उसने राधा के हाथ में लंड थमाया। राधा बोली, "ये तो बहुत बड़ा है।" विक्रम हँसा, "चिंता मत कर, तुम्हारी गीली चूत इसे ले लेगी।" उसने राधा के पैर ऊपर उठाए और अपना लंड उसकी चूत पर रखा। एक हाथ से उसका मुँह दबाया और लंड अंदर डाल दिया। राधा को दर्द हुआ, वह चीखना चाहती थी, "आह, निकालो, मर जाऊँगी," लेकिन विक्रम ने नहीं सुना। धीरे-धीरे धक्के देने लगा। थोड़ी देर में राधा को भी मजा आने लगा।<br /><br />करीब आधे घंटे तक चुदाई चली। विक्रम शांत हुआ, और राधा संतुष्ट हो गई। दोनों ने उस रात खूब मजा किया।<br /><br />नया आत्मविश्वास<br /><br />उस रात के बाद, जब भी मौका मिलता, राधा और विक्रम मिलते और चुदाई करते। राधा को अब खुद पर विश्वास हो गया था। वह खुश थी कि उसे भी कोई चाहने वाला मिल गया था। उसका डर और हीनभावना खत्म हो चुकी थी।</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%aa%e0%a4%b9%e0%a4%b2%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%a8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>डिलीवरी बॉय के साथ रात भर मस्ती</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%89%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%b0-%e0%a4%ae/</link>
                        <pubDate>Sat, 26 Apr 2025 20:06:09 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[दोस्तों, मैं नाजिया, आपकी चटपटी कहानी के साथ हाजिर हूँ! ये तड़केदार देसी भाभी की चुदाई की कहानी मेरी अपनी है, जिसमें मैंने एक डिलीवरी बॉय के साथ रात भर चुदाई का लुत्फ उठाया। मेरी चुदाई की भूख...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p>दोस्तों, मैं नाजिया, आपकी चटपटी कहानी के साथ हाजिर हूँ! ये तड़केदार देसी भाभी की चुदाई की कहानी मेरी अपनी है, जिसमें मैंने एक डिलीवरी बॉय के साथ रात भर चुदाई का लुत्फ उठाया। मेरी चुदाई की भूख ऐसी है कि शादी के बाद भी मैंने कई यार बनाए। लेकिन एक रात, जब मेरा कोई यार नहीं आ सका, तो मैंने किसके साथ मस्ती की?<br /><br />मैंने जवानी के दिनों से ही सेक्स का मजा लेना शुरू कर दिया था। कॉलेज में मेरी सहेलियाँ गंदी-गंदी बातें करती थीं – लंड, चूत, और चुदाई की बातें! उनकी बातें सुनकर मेरी चूत में आग सी लग जाती थी। खासकर लंड की बातें – उसे पकड़ना, चूमना, चूसना – इन सब ने मेरे मन में चुदाई की तलब जगा दी।<br /><br />एक दिन मैंने अपनी जिगरी सहेली नेहा से दिल की बात शेयर की। उसने कहा, “टेंशन मत ले, मैं अपने कजिन का लंड तुझे दिलवाऊँगी!” मैं तो खुशी से पागल हो गई। एक दिन उसने मुझे अपने कजिन का लंड दिखाया, और वो मेरी जिंदगी का पहला लंड था। फिर नेहा ने अपने कजिन से मेरी चूत में लंड डलवा दिया। उस दिन मुझे चुदाई का असली मजा समझ आया।<br /><br />बस, फिर मैं रुकी नहीं। शादी से पहले मैं कई लड़कों से चुद चुकी थी।<br /><br />मेरा नाम नाजिया है। मैं 30 साल की हूँ, हसीन, सेक्सी और हॉट। मेरा पति बिजनेस के सिलसिले में अक्सर बाहर जाता है, कभी-कभी विदेश भी। मैं उसकी गैरहाजिरी में पराये मर्दों से चुदवाती हूँ – कभी घर बुलाकर, कभी उनके घर जाकर, कभी होटल में, तो कभी सेक्स पार्टी में। अब तो पराये लंड लेना मेरी आदत बन चुकी है। मेरा दिमाग दिन-रात लंड के इर्द-गिर्द ही घूमता है।<br /><br />एक दिन शाम 6:30 बजे मेरा पति लंदन के लिए रवाना हुआ। उसका 10 दिन का टूर था। मैंने उसे हँसकर विदा किया और लंड की तलाश में जुट गई।<br /><br />मैंने अपने एक यार को फोन किया, तो उसने कहा, “मैं बैंगलोर में हूँ, भाभी!”<br /><br />दूसरे ने कहा, “मेरी माँ की तबीयत खराब है, नहीं आ सकता।”<br /><br />तीसरे ने कहा, “मैं अपने गाँव गया हूँ।”<br /><br />ये सुनकर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था। मेरी चूत में आग लगी थी, और गांड भी बेचैन थी। मैंने सारे कपड़े उतारे और नंगी होकर टीवी पर पोर्न देखने लगी। खाना बनाने का मूड नहीं था, तो मैंने एक रेस्टोरेंट से खाना ऑर्डर कर दिया।<br /><br />पोर्न देखते हुए मैं चूत में उंगली कर रही थी। करीब डे� Littlest hour बाद दरवाजे पर खटखट हुई। मैंने एक ट्रांसपेरेंट नाइटी पहनी, जिसमें मेरे बड़े-बड़े स्तन और चूत की झांटें साफ दिख रही थीं।<br /><br />दरवाजा खोला तो सामने एक जवान, गोरा, और स्मार्ट लड़का खड़ा था। उसे देखते ही मेरा मन उस पर आ गया। वो डिलीवरी बॉय था।<br /><br />उसने कहा, “मैडम, आपका खाना।”<br /><br />मैंने खाना लिया। तभी उसने पूछा, “मैडम, एक गिलास पानी मिलेगा?”<br /><br />मैंने मुस्कुराकर कहा, “हाँ, बिल्कुल। अंदर आ, बैठ।”<br /><br />मैंने उसे अंदर बिठाया और दरवाजा लॉक कर दिया। पानी का गिलास देते वक्त मैं जानबूझकर झुकी, ताकि मेरे स्तन उसे साफ दिखें।<br /><br />पानी पीकर उसने कहा, “मैडम, आप बहुत हसीन हैं।”<br /><br />ये सुनकर मेरी चूत कुलबुला उठी। मैंने कहा, “तू भी तो बड़ा स्मार्ट है! तेरा नाम क्या है, और क्या करता है?”<br /><br />उसने बताया, “मेरा नाम अजय है। मैं रेस्टोरेंट में डिलीवरी का काम करता हूँ।”<br /><br />मैंने फिर झुककर अपने स्तन दिखाए और पूछा, “तेरा परिवार कहाँ रहता है?”<br /><br />वो बोला, “मेरी शादी नहीं हुई। मैं अकेला रहता हूँ, यहाँ से 7 किलोमीटर दूर।”<br /><br />मैंने कहा, “तो तुझे कोई रोकने वाला नहीं?”<br /><br />तभी जोर से बादल गरजे, और मैं डर के मारे उस पर गिर पड़ी। मेरे स्तन उसके सीने से टकराए। उसने मुझे प्यार से देखा और कहा, “सॉरी, मैडम!”<br /><br />मैंने कहा, “कोई बात नहीं, मैं ही डर गई।”<br /><br />तभी बारिश शुरू हो गई। मैंने कहा, “अजय, अब तू घर नहीं जा पाएगा। बारिश रुकने तक यहीं रह।”<br /><br />वो बोला, “हाँ, अब तो रुकना ही पड़ेगा।”<br /><br />मैं अंदर गई और रम की बोतल, दो गिलास, और कुछ स्नैक्स ले आई। मैंने कहा, “मौसम रोमांटिक है, चाय नहीं, रम का मजा लें।”<br /><br />मैंने उसे एक पैग बनाकर दिया और खुद भी एक लिया। हमने चियर्स किया और पीना शुरू कर दिया। मैं उसे गौर से देख रही थी, सोच रही थी कि उसका लंड कितना बड़ा होगा। उसकी पैंट में उभार देखकर लग रहा था कि लंड शानदार होगा।<br /><br />वो भी मुझे घूर रहा था। मैंने पूछा, “अजय, तूने कभी किसी लड़की को इतने करीब से देखा?”<br /><br />वो बोला, “हाँ, देखा है, पर तुम जितना करीब से नहीं।”<br /><br />मैंने कहा, “मुझमें क्या खास है?”<br /><br />वो बोला, “तुम तो पूरी तरह खास हो।”<br /><br />मैंने हँसकर कहा, “बड़ा फ्लर्ट है तू!”<br /><br />वो बोला, “तुम जैसी हसीना के सामने कौन फ्लर्ट नहीं करेगा?”<br /><br />मैंने पूछा, “बता, तूने कभी किसी के साथ सेक्स किया?”<br /><br />वो थोड़ा हिचकिचाया, फिर बोला, “हाँ, किया है।”<br /><br />मैंने सेक्सी अंदाज में कहा, “मुझे मैडम मत बोल। मैं नाजिया हूँ, मस्त नाजिया, रंडी नाजिया!”<br /><br />मेरी गालियों ने उसमें आग लगा दी। उसकी पैंट में लंड का उभार साफ दिख रहा था। दो-दो पैग पीने के बाद नशा चढ़ने लगा। मेरी नाइटी खिसक गई, और उसकी शर्ट भी।<br /><br />वो बोला, “मुझे बाथरूम जाना है।” मैं उसे बाथरूम ले गई। उसकी पैंट की जिप अटक गई। मैंने आगे बढ़कर उसकी जिप खोली और लंड बाहर निकाला।<br /><br />वो पेशाब करने लगा, और मैं उसका लंड चाव से देखने लगी। पेशाब के बाद उसने जिप बंद करनी चाही, तो मैंने कहा, “पैंट उतार दे, गीली हो गई।”<br /><br />मैंने उसकी पैंट और शर्ट उतरवा दी और उसे नंगा बेड पर लिटा दिया। मैंने भी अपनी नाइटी उतारी और नंगी उसकी टाँगों के बीच बैठ गई। मैंने उसका लंड पकड़कर हिलाना शुरू किया।<br /><br />पल भर में लंड पूरा तन गया। इतना मोटा और लंबा था कि मेरी मुठ्ठी में नहीं आ रहा था। मैंने दोनों हाथों से उसे हिलाया, और टोपा मुँह में लेकर चूसने लगी। मैं उसके नंगे बदन पर हाथ फेर रही थी।<br /><br />वो जोश में आ गया। अचानक उसने मुझे नीचे लिटाया और मेरे ऊपर चढ़ गया। बोला, “नाजिया, तुझे नंगी देखकर मेरा लंड बेकाबू हो गया। तेरे बड़े-बड़े स्तन मुझे पागल कर रहे हैं।”<br /><br />वो मेरे स्तनों को मसलने लगा और चूत पर उंगलियाँ फेरने लगा। मेरी हल्की झांटें उसे बहुत पसंद आईं।<br /><br />उसने लंड मेरी चूत पर रगड़ना शुरू किया। मुझे मजा आने लगा। फिर उसने एक झटके में पूरा लंड मेरी चूत में पेल दिया। मैंने चिल्लाकर कहा, “हरामी, एक बार में पूरा डाल दिया? मेरी चूत फट गई!”<br /><br />वो जोर-जोर से चोदने लगा। मैं जन्नत में पहुँच गई। मैंने कहा, “साले, खूब चोद मुझे! मेरी चूत का भोसड़ा बना दे! तेरा लंड मेरी बच्चेदानी को ठोक रहा है। रोज आया कर मुझे चोदने!”<br /><br />उसने मुझे घोड़ी बनाया और पीछे से लंड पेल दिया। मुझे स्वर्ग का मजा आने लगा। मैंने पूछा, “कितनों को चोदा है तूने?”<br /><br />वो बोला, “मेरी शादी नहीं हुई, पर मैं 4 औरतों को चोद रहा हूँ। परसों एक भाभी को चोदा था।”<br /><br />उसकी बात ने मेरी उत्तेजना दोगुनी कर दी। मैं और मस्ती से चुदवाने लगी। थोड़ी देर बाद उसने मुझे अपने लंड पर बिठा लिया। मैं लंड पर उछल-उछलकर चुदवाने लगी।<br /><br />मैं इतनी उत्तेजित हो गई कि मेरी चूत ने पानी छोड़ दिया। मैं लंड से उतरी और उसे मुठ्ठी में लेकर चूसने लगी। पल भर में उसका माल मेरे मुँह में आ गया। मैंने सब गटक लिया और टोपा चाटकर चमका दिया।<br /><br />हम बाथरूम गए, नहाए, और नंगे ही खाना खाया। खाते वक्त गंदी बातें कीं, जिससे उसका लंड फिर तन गया।<br /><br />इस बार उसने कहा, “नाजिया, अब तेरी गांड मारूँगा!” उसने मेरे चूतड़ों पर थप्पड़ मारा और गांड में उंगली डाल दी। मैं भी गांड मरवाने को तैयार थी, तो घोड़ी बन गई।<br /><br />उसने लंड मेरी गांड में पेल दिया। मैं चिल्लाई, “मादरचोद, मेरी गांड फाड़ दी!” वो तूफान की तरह मेरी गांड मारता रहा।<br /><br />बारिश रात भर चली। हम नंगे ही सो गए। सुबह उसने एक बार फिर मेरी चूत में लंड पेला। सुबह की चुदाई का मजा बेमिसाल था।<br /><br />जाते वक्त मैंने उसे चूमा और कहा, “अजय, अब मैं रोज खाना मंगवाऊँगी। तू ही खाना लाना और मुझे चोदकर जाना। मैं तेरे लंड की दीवानी हो गई हूँ।”</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%a1%e0%a4%bf%e0%a4%b2%e0%a5%80%e0%a4%b5%e0%a4%b0%e0%a5%80-%e0%a4%ac%e0%a5%89%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a4-%e0%a4%ad%e0%a4%b0-%e0%a4%ae/</guid>
                    </item>
				                    <item>
                        <title>मैं राधिका हूँ</title>
                        <link>https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/</link>
                        <pubDate>Sat, 26 Apr 2025 04:34:28 +0000</pubDate>
                        <description><![CDATA[मेरा नाम राधिका है। ये कहानी तब की है जब मैं अपनी शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल, एक छोटे से गाँव में, अपने नए जीवन की शुरुआत करने आई थी। मेरी उम्र उस वक्त 26 साल थी, और मेरे पति, विशाल, 3...]]></description>
                        <content:encoded><![CDATA[<p dir="ltr" data-pm-slice="1 1 []">मेरा नाम राधिका है। ये कहानी तब की है जब मैं अपनी शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल, एक छोटे से गाँव में, अपने नए जीवन की शुरुआत करने आई थी। मेरी उम्र उस वक्त 26 साल थी, और मेरे पति, विशाल, 35 साल के थे। वो नेवी में लेफ्टिनेंट थे, और उनकी ड्यूटी की वजह से हमारी नई-नई शादी का हनीमून भी अधूरा रह गया था। शादी के महज दस दिन बाद ही उन्हें एक इमरजेंसी कॉल आया, और उन्हें तुरंत ड्यूटी पर जाना पड़ा।</p>
<p dir="ltr">मैं उन्हें स्टेशन छोड़ने गई थी। ट्रेन के हॉर्न की आवाज़ और भीड़ के शोर में मेरे मन में एक अजीब सा खालीपन था। विशाल ने मुझे गले लगाया और कहा, “राधिका, मैं जल्दी लौटूँगा। गाँव में सब तुम्हारा ख्याल रखेंगे।” मैंने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मन भारी था।</p>
<p dir="ltr">ट्रेन जैसे ही प्लेटफॉर्म पर रुकी, एक लंबा-चौड़ा आदमी, जिसके चेहरे पर रौब और आँखों में चमक थी, उतरा। विशाल ने मुझे उससे मिलवाया, “ये हैं ठाकुर रघुवीर सिंह, हमारे गाँव के मुखिया।” रघुवीर ने मेरी ओर देखा, उनकी नज़रें कुछ ज्यादा ही गहरी थीं। “राधिका जी, आप हमारे गाँव की शान हैं। कोई भी परेशानी हो, मुझे याद करना,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी गर्माहट थी, जो मुझे थोड़ा असहज कर गई। मैंने सिर्फ़ “जी” कहा और सिर झुका लिया।</p>
<p dir="ltr">विशाल ट्रेन में चढ़ गए, और मैं अकेली स्टेशन पर खड़ी रह गई। रघुवीर ने एक बार फिर मेरी ओर देखा और मुस्कुराते हुए चले गए। मैं भारी मन से ससुराल लौट आई।</p>
<hr />
<h3 dir="ltr">अगला दिन</h3>
<p dir="ltr">अगले दिन मैं गाँव के स्कूल में बच्चों के लिए एक छोटी सी पेंटिंग वर्कशॉप में गई। मैंने हमेशा से बच्चों को पढ़ाने और कला सिखाने का शौक रखा था। उस दिन मैंने एक गहरे नीले रंग की साड़ी पहनी थी, जिसके साथ चांदनी रंग का ब्लाउज़ था। साड़ी का पल्लू हल्का-सा लहरा रहा था, और मुझे अपनी नई ज़िंदगी में कुछ अच्छा करने की उम्मीद थी।</p>
<p dir="ltr">शाम को स्कूल से लौटते वक्त सूरज डूब रहा था। मेरा घर स्कूल से करीब 8 किलोमीटर दूर था, और मैं पैदल ही निकल पड़ी। रास्ते में खेतों की हरियाली और हल्की ठंडी हवा मन को सुकून दे रही थी। लेकिन तभी अचानक आसमान में काले बादल छा गए। बिजली कड़की, और बारिश की बूंदें टपकने लगीं।</p>
<p dir="ltr">मैंने जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाए, लेकिन बारिश तेज़ हो गई। मेरी साड़ी भीगकर शरीर से चिपकने लगी। मैं एक बड़े बरगद के पेड़ के नीचे रुक गई, पर बारिश इतनी तेज़ थी कि पेड़ की छांव भी बेकार थी। तभी मेरा फोन बजा। नंबर अनजाना था।</p>
<p dir="ltr">“हैलो?” मैंने डरते हुए फोन उठाया।<br />“राधिका जी, मैं रघुवीर बोल रहा हूँ। आप कहाँ हैं? बारिश में भीग रही हैं, मेरे घर आ जाइए। ये जगह ठीक नहीं है,” उनकी आवाज़ में वही रौब था, पर इस बार एक अजीब सी चिंता भी।</p>
<p dir="ltr">मैं हिचकिचाई, लेकिन बारिश और ठंड में मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था। मैंने उनके बताए रास्ते पर चलना शुरू किया। कुछ ही मिनटों में मैं उनके बड़े से हवेली जैसे घर के सामने थी। दरवाज़ा खुला था। मैं अंदर गई।</p>
<p dir="ltr">रघुवीर सामने खड़े थे। उनकी शर्ट के बटन खुले थे, और गीले बालों से पानी टपक रहा था। “आइए, राधिका जी। भीग गई हैं आप। अंदर आकर कपड़े बदल लीजिए,” उन्होंने कहा। उनकी नज़रें मेरी साड़ी पर रुकीं, जो मेरे शरीर से चिपककर मेरी 34-26-36 की फिगर को साफ़ उभार रही थी।</p>
<p dir="ltr">मैंने शर्मिंदगी महसूस की, पर उनकी पत्नी घर पर नहीं थीं। “वो शहर गई हैं,” रघुवीर ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा। मैंने कुछ नहीं कहा और उनके बताए कमरे में चली गई।</p>
<hr />
<h3 dir="ltr">हवेली का कमरा</h3>
<p dir="ltr">कमरे में एक बड़ा सा वार्डरोब था। मैंने उसे खोला तो उसमें ढेर सारी डिज़ाइनर ड्रेसेस थीं। मेरी नज़र एक काले रंग की साटन ड्रेस पर पड़ी, जो बिना बाहों की थी और घुटनों तक थी। मैंने अपनी गीली साड़ी उतारी, उसे ड्रायर में डाला, और वो ड्रेस पहन ली। ड्रेस मेरे शरीर पर बिल्कुल फिट थी, लेकिन थोड़ी टाइट होने की वजह से मेरी फिगर और उभर रही थी।</p>
<p dir="ltr">मैं बाहर आई तो रघुवीर ड्रॉइंग रूम में बैठे थे। टेबल पर गर्म चाय और प्याज़ के पकौड़े रखे थे। “आइए, गरमा-गर्म चाय पीजिए,” उन्होंने कहा। उनकी आँखों में एक चमक थी, जो मुझे असहज और उत्साहित दोनों कर रही थी।</p>
<p dir="ltr">मैं सोफे पर बैठ गई। ड्रेस थोड़ी छोटी थी, और मेरी जांघें साफ़ दिख रही थीं। रघुवीर की नज़रें बार-बार मेरी ओर जा रही थीं। मैंने चाय का कप उठाया और धीरे-धीरे पीने लगी।</p>
<p dir="ltr">“आप गाँव में अकेली हैं, राधिका जी। कोई चाहिए तो मुझे बता देना,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा नशा था। मैंने हल्के से मुस्कुराकर “जी, शुक्रिया” कहा।</p>
<p dir="ltr">मैंने घर पर फोन किया और कहा, “माँ जी, बारिश बहुत तेज़ है। मैं एक सहेली के घर रुक रही हूँ। आज नहीं आ पाऊँगी।” माँ जी ने कहा, “ठीक है, बेटी। ख्याल रखना।”</p>
<p dir="ltr">रघुवीर ने मेरी बात सुनकर मुस्कुराते हुए कहा, “चालाकी भी जानती हैं आप।” मैंने हँसकर जवाब दिया, “ज़िंदगी सिखा देती है।”</p>
<hr />
<h3 dir="ltr">माहौल में गर्मी</h3>
<p dir="ltr">माहौल अब हल्का और मस्ती भरा हो गया था। मैंने अपने पैर सोफे पर मोड़े और थोड़ा खुलकर बैठ गई। रघुवीर उठकर मेरे पास आए और मेरे बगल में बैठ गए। “पकौड़े खाइए, स्वादिष्ट हैं,” उन्होंने कहा।</p>
<p dir="ltr">उनकी नज़रें मेरी ड्रेस के गले से होते हुए मेरी जांघों तक जा रही थीं। मुझे उनकी ये बेबाकी पसंद आ रही थी। मैंने सोचा, क्यों न थोड़ा मज़ा लिया जाए? मैंने अपने बालों को खोलकर पीछे की ओर झटका दिया, जिससे मेरी गर्दन और कंधे साफ़ दिखने लगे।</p>
<p dir="ltr">रघुवीर की साँसें तेज़ हो गईं। उन्होंने धीरे से मेरी जांघ पर हाथ रखा और सहलाने लगे। मैंने हल्का सा विरोध किया, “ये ठीक नहीं है, ठाकुर साहब।” लेकिन मेरी आवाज़ में वो दम नहीं था।</p>
<p dir="ltr">वो और पास खिसक आए। उनकी उंगलियाँ मेरी ड्रेस के किनारे से अंदर चली गईं। मैं सिहर उठी। फिर उन्होंने मेरे कानों को धीरे से चूमा और मेरे सीने को सहलाने लगे। मेरे शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ रही थी।</p>
<p dir="ltr">मैंने उनकी कमर पर हाथ रखा और उनकी पैंट के अंदर हाथ डाल दिया। उनका मर्दाना अंग मेरे हाथ में आया, और मैंने उसे धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। रघुवीर सिहर उठे। उन्होंने मेरी ड्रेस के बटन खोल दिए, और ड्रेस मेरी कमर तक सरक गई।</p>
<p dir="ltr">“राधिका, तुम आग हो,” उन्होंने कहा और मुझे अपनी बाहों में खींच लिया। उनकी छाती मेरे सीने से सट गई, और उनका गर्म अंग मेरी नाभि को छू रहा था।</p>
<hr />
<h3 dir="ltr">बेडरूम की आग</h3>
<p dir="ltr">रघुवीर ने मुझे गोद में उठाया और बेडरूम में ले गए। बेड इतना बड़ा था कि उसमें चार लोग आसानी से सो सकते थे। उन्होंने मुझे बेड पर लिटाया और मेरी ड्रेस पूरी तरह उतार दी। मैं सिर्फ़ अपनी काली लेस वाली अंतर्वस्त्रों में थी।</p>
<p dir="ltr">वो मेरे ऊपर झुक गए और मेरे होंठों को चूमने लगे। उनकी जीभ मेरे मुँह में थी, और मैं भी उस पल में खो गई। फिर वो नीचे सरके और मेरे अंतर्वस्त्र उतार दिए। उनकी जीभ मेरे सबसे नाज़ुक हिस्से पर थी, और मैं सिसकारियाँ लेने लगी।</p>
<p dir="ltr">“रघुवीर, प्लीज़...” मैंने तड़पते हुए कहा।<br />“क्या चाहिए, राधिका? साफ़-साफ़ बोलो,” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाते हुए कहा।</p>
<p dir="ltr">मैं शर्म से लाल हो गई, लेकिन मेरे शरीर की आग मुझे बोलने पर मजबूर कर रही थी। “मुझे चाहिए तुम... अब और मत तड़पाओ,” मैंने कहा।</p>
<p dir="ltr">रघुवीर ने अपनी पैंट उतारी और मेरे ऊपर आ गए। उनका कठोर अंग मेरे नाज़ुक हिस्से को छू रहा था। उन्होंने धीरे से दबाव डाला, और मैं दर्द से चीख उठी। “आह... धीरे...” मैंने कहा।</p>
<p dir="ltr">वो रुक गए और मेरे आँसुओं को चूमने लगे। “आज तुम्हें स्वर्ग दिखाऊँगा,” उन्होंने कहा और फिर धीरे-धीरे अंदर आए। दर्द धीरे-धीरे मज़े में बदलने लगा। उनकी हर हरकत मेरे शरीर में बिजली दौड़ा रही थी।</p>
<p dir="ltr">कमरे में सिर्फ़ मेरी सिसकारियाँ और बेड की चरमराहट गूँज रही थी। रघुवीर ने मुझे अपनी बाहों में कस लिया और तेज़ी से धक्के मारने लगे। मैं भी पूरी तरह उस मस्ती में डूब गई।</p>
<p dir="ltr">“राधिका, कहाँ?” उन्होंने तेज़ साँसों के बीच पूछा।<br />“बाहर... प्लीज़,” मैंने कहा।</p>
<p dir="ltr">उन्होंने मेरे पेट पर अपना रस गिराया और मेरे बगल में लेट गए। हम दोनों की साँसें तेज़ थीं। कुछ देर बाद मैंने देखा कि बारिश रुक चुकी थी।</p>
<hr />
<h3 dir="ltr">घर वापसी</h3>
<p dir="ltr">मैंने अपनी साड़ी पहनी और घर के लिए निकल पड़ी। रास्ते में ठंडी हवा मेरे चेहरे को छू रही थी, लेकिन मेरे मन में एक तूफान सा उठ रहा था। जो हुआ, वो गलत था या सही? क्या मैंने अपनी इच्छाओं को आज़ाद कर दिया, या ये सिर्फ़ एक कमज़ोर पल था?</p>
<p dir="ltr">घर पहुँचकर मैंने शीशे में खुद को देखा। मेरे चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी। लेकिन मेरे मन में सवालों का सैलाब था। क्या मैं फिर कभी रघुवीर से मिलूँगी? या ये सिर्फ़ एक रात की सुलगती रात थी?</p>]]></content:encoded>
						                            <category domain="https://ranginkahani.fun/community/"></category>                        <dc:creator>Admin</dc:creator>
                        <guid isPermaLink="true">https://ranginkahani.fun/community/main-forum/%e0%a4%ae%e0%a5%88%e0%a4%82-%e0%a4%b0%e0%a4%be%e0%a4%a7%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%b9%e0%a5%82%e0%a4%81/</guid>
                    </item>
							        </channel>
        </rss>
		